Shree Ram Sena Parishad
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27/05/2026
आज हनुमान मंदिर जोधपुर राजस्थान में श्री हनुमान जी के दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ इस अवसर पर श्री राम सेना परिषद संस्थापक श्री आनन्द कुमार जी, और चैयरमैन श्री सर्वेश त्यागी जी उपस्थित रहे,
जय जय जय श्री राम
जय जय श्री हनुमान जी
जय श्री राम सेना परिषद
16/05/2026
Shout out to my newest followers! Excited to have you onboard! Umesh Thakur, Sandeep Officiall Tr, Rupesh Rupesh, Ali Lak, Harisaran Kumar, مسافر افغان
11/05/2026
पुरानी हवेलियों के सामने बना “आला” केवल वास्तु का भाग नहीं था, वह भारतीय गृह-संस्कृति, कुलपरंपरा और लोक-आध्यात्मिक व्यवस्था का जीवित केंद्र होता था।
आज जिस स्थान को लोग केवल “दीपक रखने की जगह” समझ लेते हैं, वास्तव में वह घर और देवत्व के मध्य एक सूक्ष्म संबंध-बिंदु माना जाता था।
लगभग 40–50 वर्ष पहले तक उत्तर भारत, राजस्थान, बुंदेलखंड, मालवा, ब्रज और पहाड़ी क्षेत्रों में यह परंपरा सामान्य थी कि संध्या के समय प्रत्येक घर के बाहर कुलदेवी, ग्रामदेवता या पितृ-रक्षा हेतु दीप प्रज्वलित किया जाए।
इसे केवल धार्मिक कर्मकांड नहीं,
बल्कि “गृह-रक्षा विधान” माना जाता था।
भारतीय लोकपरंपराओं में “द्वार” को अत्यंत संवेदनशील स्थान माना गया है।
यही कारण है कि गृहप्रवेश, तोरण, स्वस्तिक, गोबर-लेपन, रंगोली और दीपदान —
इन सबका केंद्र घर का प्रवेशद्वार ही होता था।
स्कन्दपुराण और पद्मपुराण में संध्या दीपदान को
“अलक्ष्मी नाशक” कहा गया है।
लोकमान्यता थी कि जहाँ प्रतिदिन दीप जलता है,
वहाँ दरिद्रता, कलह और नकारात्मकता का प्रभाव कम होता है।
मनुस्मृति और गृह्यसूत्रों में भी संध्या समय अग्नि और प्रकाश को
गृहस्थ धर्म का आवश्यक अंग बताया गया है।
क्योंकि भारतीय दर्शन में दीप केवल प्रकाश नहीं,
“चेतना” का प्रतीक है।
यही कारण था कि पुराने समय में हवेलियों के बाहर बने आले
अक्सर उत्तर-पूर्व दिशा, मुख्य द्वार या आँगन के समीप बनाए जाते थे।
कुछ स्थानों पर उनमें कुलदेवी का चिह्न,
त्रिशूल, श्रीयंत्र, स्वस्तिक या केवल सिंदूर का बिंदु लगाया जाता था।
राजस्थान की अनेक प्राचीन हवेलियों में आज भी
“देवरा” या “देवली” नाम से छोटे आले दिखाई देते हैं,
जहाँ संध्या के समय घी का दीपक जलाना अनिवार्य माना जाता था।
गढ़वाल और कुमाऊँ क्षेत्रों में ग्रामदेवता के नाम का दीप,
जबकि ब्रज क्षेत्र में तुलसी और कुलदेवी दोनों के लिए दीप प्रज्वलित करने की परंपरा रही।
पुराने लोग यह भी मानते थे कि
घर के बाहर जलता दीप केवल अपने परिवार के लिए नहीं होता,
बल्कि राहगीरों, अतिथियों और समस्त जीवों के लिए शुभ संकेत होता है।
इसलिए दीप को “अतिथि-सूचक” भी माना गया।
वास्तुशास्त्र में अग्नि और प्रकाश को
स्थिर ऊर्जा का प्रतीक माना गया है।
इसी कारण संध्या दीप को घर की “ऊर्जा संतुलन प्रक्रिया” से भी जोड़ा गया।
आज विज्ञान की भाषा में भले इसे अलग प्रकार से समझा जाए,
परंतु सामाजिक दृष्टि से यह एक दैनिक अनुशासन था
जो परिवार को प्रतिदिन एक समय पर एकत्र करता था।
ध्यान देने योग्य बात यह है कि
पुराने समाज में धर्म केवल बड़े मंदिरों तक सीमित नहीं था।
हर घर स्वयं एक लघु-तीर्थ माना जाता था।
तुलसी चौरा, आँगन, रसोई की अग्नि,
कुलदेवी का आला और पितरों का स्थान —
ये सब मिलकर भारतीय गृह-संस्कृति की आत्मा बनाते थे।
आज हवेलियाँ बची हैं,
पर उनके आले सूने हो गए।
दीवारें हैं, नक्काशी है, विशाल दरवाज़े हैं,
लेकिन संध्या का वह दीप नहीं
जो कभी पूरे मोहल्ले को यह संकेत देता था कि
“इस घर में अभी भी परंपरा जीवित है।”
।। जय जय श्री राधे कृष्ण ।।
22/04/2026
जिसने अपनी मां और पत्नी को सम्मान नहीं दिया वह महिलाओं को सम्मान देने की बात करता है इस से बड़ा मजाक और कोई नहीं हो सकता है,,
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