arun kumar
मुस्कुराहट के पीछे भी कहानी होती है ��
बचपन का साथ और अधूरा प्यार
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Arun vastra Bhandar fashion show in Delhi
आदत से लाचार मेढ़क" - एक समय की बात है एक मेंढक रोज की तरह मक्खियों का शिकार कर रहा था।उसी समय एक सांप वहां से गुजर रहा था। सांप की नजर उस मेढ़क पर पड़ जाती है सांप सोचता है चलो आज के भोजन का प्रबंध हुआ। और सांप उस मेढ़क को पीछे की ओर से एक झटके में आधा मुंह में भर लेता है।अब स्थिति ये है की मेढ़क के शरीर का पीछे का आधा हिस्सा सांप के मुंह में है और आगे का आधा हिस्सा मुंह के बाहर तभी उस मेढ़क के सामने से एक मक्खी उड़ती हुई आती है। और मेढ़क सांप के मुंह में दबे होने के बाद भी उस मक्खी के खाने के लिए अपनी जीभ बाहर निकालता है और उसे पकड़ने की कोशिश करता है। इसी को कहते है "आदत से लाचार होना" एक मेंढक जो सांप के मुँह में दबे होने के बाद भी अपनी आदत के कारण सामने आने वाली मक्खियों को खाने के लिए जीभ निकलता है।ये उसकी आदत है जिसे वो अपनी मौत को सामने देखते हुए भी छोड़ नहीं पाता।"याद रखें आपकी आदत ही आपका भविष्य तय करती है समय रहते अपनी बुरी आदतों को बदलें"
एक लड़का रोज़ भगवान से पूछता था—
“मेरी ज़िंदगी कब बदलेगी?”
एक दिन भगवान ने कहा—
“जिस दिन तुम इंतज़ार करना छोड़कर मेहनत करना शुरू कर दोगे।”
लड़के ने उसी दिन से अपनी किस्मत को कोसना छोड़ दिया और खुद को बदलना शुरू कर दिया।
कुछ साल बाद वही लोग, जो उसे कमजोर समझते थे, उसकी कामयाबी की मिसाल देने लगे।
सीख:
किस्मत दरवाज़ा खोल सकती है,
लेकिन अंदर जाने के लिए मेहनत तुम्हें ही करनी होगी। ❤️🔥
अगर आप भी अपनी ज़िंदगी बदलना चाहते हो,
तो आज से शुरुआत करो। 💯
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यह लीजिए, प्रकृति (Nature) की सुंदरता और उसके महत्व को दर्शाती हुई एक सुंदर कहानी:
एक पत्ती का सफर (A Leaf's Journey)
एक घने और हरे-भरे जंगल में, एक बहुत पुराने पीपल का पेड़ था। उस पेड़ की सबसे ऊँची डाली पर 'पीहू' नाम की एक छोटी सी हरी पत्ती रहती थी। पीहू को अपनी हरी पोशाक और ऊँची जगह पर रहना बहुत पसंद था। वह रोज़ सुबह सूरज की पहली किरण का स्वागत करती, ठंडी हवा के झोंकों के साथ झूमती और चिड़ियों के मीठे गीत सुनती थी। उसे लगता था कि उसकी दुनिया बस उस पेड़ तक ही सीमित है।
धीरे-धीरे समय बदला। मौसम बदला और पतझड़ का महीना आ गया। पीहू का हरा रंग अब बदलकर गहरा पीला और सुनहरा हो चुका था। एक सुबह हवा का एक तेज़ झोंका आया। पीहू ने अपनी डाली को कसकर पकड़ने की कोशिश की, लेकिन वह खुद को रोक नहीं पाई। वह डाली से अलग हो गई और नीचे गिरने लगी।
पीहू बहुत डर गई। उसने सोचा, "अब मेरा जीवन खत्म हो गया। मैं पेड़ से अलग होकर बेकार हो जाऊँगी।"
लेकिन प्रकृति का नियम कुछ और ही था। हवा के झोंके ने उसे ज़मीन पर सीधे गिरने नहीं दिया। वह तैरती हुई पास में बहने वाली एक साफ नदी के पानी पर जा गिरी। नदी के ठंडे पानी का स्पर्श पाकर पीहू का डर गायब हो गया। नदी ने मुस्कुराते हुए कहा, "डरो मत पीहू! तुम्हारा सफर अभी खत्म नहीं हुआ है, बल्कि एक नया सफर शुरू हुआ है।"
नदी के पानी के साथ बहते हुए पीहू ने बहुत सी नई चीज़ें देखीं। उसने पानी में तैरती रंग-बिरंगी मछलियाँ देखीं, किनारे पर पानी पीते हिरण देखे और पहाड़ों से गिरते खूबसूरत झरने देखे। पीहू को समझ आया कि जंगल के बाहर की दुनिया कितनी विशाल और सुंदर है।
कुछ दिनों बाद, नदी के एक शांत किनारे पर पीहू पानी से बाहर आ गई। वह मिट्टी पर आराम करने लगी। समय के साथ, वह पत्ती धीरे-धीरे गलकर उसी मिट्टी में मिल गई।
पीहू अब ख़त्म नहीं हुई थी, बल्कि वह उस उपजाऊ मिट्टी का हिस्सा बन चुकी थी। कुछ महीनों बाद, उसी मिट्टी से एक छोटा सा नया पौधा अंकुरित हुआ। पीहू अब उस नए पौधे के रूप में फिर से जी उठी थी।
कहानी से सीख
प्रकृति में कुछ भी बेकार या ख़त्म नहीं होता। हर अंत एक नई शुरुआत की ओर ले जाता है। प्रकृति का हर हिस्सा—चाहे वह एक छोटी सी पत्ती हो, पानी की बूंद हो या हवा—सब एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं और मिलकर इस जीवन चक्र को चलाते हैं।
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