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तेजी से बढ़ रहे स्वाइन फ्लू के मामले, जानें किन लोगों को ज्यादा खतरा? 12/08/2026

Swine Flu: दिल्ली में इस साल H1N1 यानी इन्फ्लूएंजा A वायरस के मामलों में बढ़ोतरी देखने को मिल रही है.रिपोर्ट के मुताबिक, 6 अगस्त 2026 तक दिल्ली में इस साल स्वाइन फ्लू के 1,349 पुष्ट मामले सामने आए हैं. दिल्ली सरकार ने यह आंकड़ा बताया है. रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली के कुछ अस्पतालों में H1N1 के मरीजों की संख्या बढ़ी है. वहीं बारिश और बदलते मौसम के बीच देश के कुछ इलाकों में स्वाइन फ्लू के मामले बढ़ रहे हैं. स्वाइन फ्लू को इन्फ्लूएंजा A H1N1 भी कहा जाता है. डॉक्टरों के मुताबिक मानसून का लंबा मौसम, तापमान में उतार चढ़ाव और वायरस की सक्रियता रहने से से इस समय इन्फेक्शन के ज्यादा मामले देखे जा रहे हैं. हालांकि ज्यादातर मरीजों में बीमारी हल्की रहती है और सही देखभाल से वे ठीक हो जाते हैं.
लोगों को ज्यादा सावधानी की जरूरत
विशेषज्ञ डॉक्टर के मुताबिक छोटे बच्चों, बुजुर्गों, गर्भवती महिलाओं और कमजोर रोग प्रतिरोधक क्षमता वाले लोगों में स्वाइन फ्लू गंभीर हो सकता है. पहले से फेफड़ों की बीमारी, दिल की बीमारी, डायबिटीज या किडनी की बीमारी से जूझ रहे लोगों को भी खास सावधानी बरतने की जरूरत है.2 ऐसे लोगों में सांस लेने में परेशानी जैसी दिक्कतें ज्यादा हो सकती हैं.
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बुखार और खांसी को न करें नजरअंदाज
डॉक्टर के अनुसार स्वाइन फ्लू होने पर अचानक बुखार, खांसी, गले में खराश, सिरदर्द, शरीर में दर्द, नाक से जुड़ी परेशानी और थकान जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं. ज्यादातर मामलों में आराम और लक्षणों के अनुसार इलाज किया जाता है. डॉक्टर जरूरत पड़ने पर शुरुआती समय में ओसेल्टामिविर जैसी एंटीवायरल दवा दे सकते हैं.
दिक्कत हो तो तुरंत अस्पताल जाएं
अगर बुखार लगातार बना हुआ है या बढ़ रहा है, सांस लेने में परेशानी हो रही है, ऑक्सीजन का स्तर कम हो रहा है, सीने में बेचैनी है या मरीज की हालत तेजी से बिगड़ रही है, तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए. बहुत ज्यादा नींद आना या असामान्य कमजोरी भी गंभीर स्थिति का संकेत हो सकती है.
इन बातों का रखें ध्यान
स्वाइन फ्लू से बचने के लिए हाथों को नियमित रूप से साबुन से धोना, इन्फेक्टिड लोगों से दूरी रखना और भीड़भाड़ वाली जगहों पर सावधानी बरतना जरूरी है. डॉक्टर की सलाह से फ्लू का टीका भी लगवाया जा सकता है. इन्फेक्टिड होने पर दूसरों के संपर्क में आने से बचना और डॉक्टर की सलाह के अनुसार इलाज लेना जरूरी है. स्वाइन फ्लू के लक्षण सामान्य फ्लू जैसे हो सकते हैं, इसलिए केवल लक्षण देखकर खुद दवा लेना सही नहीं है. खासकर बच्चों, बुजुर्गों, गर्भवती महिलाओं और पहले से बीमार लोगों को लक्षण होने पर डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए
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तेजी से बढ़ रहे स्वाइन फ्लू के मामले, जानें किन लोगों को ज्यादा खतरा? Swine Flu:देश के कुछ इलाकों में स्वाइन फ्लू के मामले बढ़ रहे हैं. डॉक्टरों ने बच्चों, बुजुर्गों, गर्भवती महिलाओं और गंभीर ...

नॉनवेज या वेज? किसे खाने वाले जीते हैं लंबा जीवन? 11/08/2026

Vegetarian VS Non Vegetarian:वेज खाना बेहतर है या नॉनवेज, ये बहस हर घर की डाइनिंग टेबल पर कभी न कभी छिड़ ही जाती है. कुछ लोग शाकाहार को लंबी उम्र का राज मानते हैं, तो कुछ का कहना है कि मांसाहार में मिलने वाला प्रोटीन और पोषण शरीर के लिए ज्यादा फायदेमंद है. लेकिन असल में सेहत और लंबी जिंदगी के लिए कौन सी डाइट बेहतर मानी जाती है? आइए एक्सपर्ट्स और रिसर्च के हवाले से इस सवाल का जवाब ढूंढते हैं.
शाकाहार के फायदे क्या कहते हैं
कई रिसर्च में यह बात सामने आई है कि शाकाहारी लोगों में दिल की बीमारी, हाई ब्लड प्रेशर, टाइप 2 डायबिटीज और कैंसर जैसी पुरानी बीमारियों का खतरा कम पाया जाता है. शाकाहारियों का वजन और बॉडी मास इंडेक्स भी आमतौर पर कम रहता है, क्योंकि उनकी डाइट फाइबर और एंटीऑक्सीडेंट्स से भरपूर होती है. सब्जियों और फलों से मिलने वाला विटामिन ई, सी और कैरोटीन शरीर को अंदर से मजबूत बनाने में मदद करता है, और सैचुरेटेड फैट कम मात्रा में मिलने की वजह से दिल पर दबाव भी कम पड़ता है.
नॉनवेज को लेकर भी सामने आ रहे नए दावे
लंबे समय तक यही माना जाता रहा कि शाकाहारी लोग ज्यादा लंबा जीते हैं, लेकिन हाल ही में चीन में बुज़ुर्गों पर हुई एक स्टडी ने इस सोच को चुनौती दी है. इस रिसर्च के मुताबिक पूरी तरह वीगन डाइट फॉलो करने वालों के 100 साल की उम्र तक पहुंचने के चांस, नॉनवेज खाने वालों के मुकाबले कम पाए गए. यानी बुढ़ापे में शरीर को जिस तरह के पोषण की जरूरत होती है, वो सिर्फ प्लांट बेस्ड डाइट से पूरी नहीं हो पाती है.
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बीच का रास्ता भी है एक ऑप्शन
इसी स्टडी में एक दिलचस्प बात यह भी सामने आई कि जो लोग मछली या डेयरी प्रोडक्ट्स लेते हैं यानी पेस्को वेजिटेरियन डाइट फॉलो करते हैं, उनकी उम्र और नॉनवेज खाने वालों की उम्र में बहुत बड़ा फर्क नहीं देखा गया. इससे यह साफ होता है कि पूरी तरह वेज या पूरी तरह नॉनवेज होने की बजाय, बैलेंस्ड डाइट लंबी और सेहतमंद जिंदगी के लिए जयादा अहम भूमिका निभा सकती है.
और भी फैक्टर हैं जिम्मेदार
रिसर्चर्स का यह भी कहना है कि लंबी उम्र सिर्फ खाने की आदतों पर निर्भर नहीं करती. जेनेटिक्स, लाइफस्टाइल, फिजिकल एक्टिविटी और ओवरऑल हेल्थ जैसे कई फैक्टर भी इसमें बराबर की भूमिका निभाते हैं. यही वजह है कि सिर्फ वेज या नॉनवेज होने से ही किसी की उम्र लंबी या छोटी होने की गारंटी नहीं दी जा सकती.
एक्सपर्ट्स की सलाह क्या है
हेल्थ एक्सपर्ट्स की मानें तो नॉनवेज खाने वालों को कम फैट वाले मीट चुनने चाहिए, साथ ही डाइट में प्लांट बेस्ड प्रोटीन को भी शामिल करना चाहिए. वहीं हर व्यक्ति की पोषण संबंधी जरूरतें उम्र, जेंडर, एक्टिविटी लेवल और ओवरऑल हेल्थ के हिसाब से अलग अलग हो सकती है, इसलिए डाइट प्लान बनाने से पहले न्यूट्रिशनिस्ट या डॉक्टर से सलाह लेना सबसे बेहतर तरीका माना जाता है.
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नॉनवेज या वेज? किसे खाने वाले जीते हैं लंबा जीवन? Vegetarian VS Non Vegetarian:शाकाहारी डाइट दिल की बीमारी, डायबिटीज और कैसर का खतरा कम करती है, लेकिन हाल की एक स्टडी बताती है कि नॉनवे.....

कांगो में इबोला से 2000 मौतें, तेजी से फैल रहा वायरस 11/08/2026

Ebola Outbreak in Congo : दुनिया में इबोला के प्रकोप को लेकर चिंता एक बार फिर बढ़ गई है. अफ्रीकी देश डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो में वायरस का संक्रमण तेजी से बढ़ रहा है और अब इससे होने वाली मौतों का आंकड़ा 2 हजार के पार पहुंच गया है. सबसे चिंता की बात यह है कि इस बार इबोला का प्रकोप रिकॉर्ड तेजी से बढ़ रहा है. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, अब तक 4,381 मामलों की पुष्टि हो चुकी है, जबकि 2,011 लोगों की मौत हो गई है. वहीं, 704 मरीज अभी अस्पतालों में भर्ती हैं और उन्हें आइसोलेशन में रखा गया है.
तीन हफ्तों में 1000 से 2000 हुई मौतें
रिपोर्ट के मुताबिक, संक्रमण से मौतों का आंकड़ा 1,000 तक पहुंचने में करीब 9 हफ्ते लगे थे. लेकिन इसके बाद अगले 1,000 मौतों का आंकड़ा सिर्फ करीब 3 हफ्तों में पार हो गया. इसी तेजी की वजह से इसे अब तक का सबसे तेजी से बढ़ने वाला इबोला प्रकोप बताया जा रहा है.
Bundibugyo स्ट्रेन क्यों बढ़ा रहा चिंता?
इस प्रकोप में Bundibugyo प्रजाति का इबोला वायरस सामने आया है. WHO के मुताबिक, इस वायरस के लिए अभी कोई वैक्सीन या विशेष उपचार उपलब्ध नहीं है. हालांकि कुछ वैक्सीन और इलाज के ऑप्शनों को लेकर रिसर्च जारी है. वहीं स्वास्थ्य अधिकारी वायरस की निगरानी, मरीजों को आइसोलेट करने, संपर्क में आए लोगों की पहचान, क्लीनिकल केयर और स्थानीय लोगों के सहयोग के जरिए संक्रमण को कंट्रोल करने की कोशिश कर रहे हैं.
मई में हुई थी आधिकारिक घोषणा
कांगो में इस इबोला प्रकोप की आधिकारिक घोषणा 15 मई को की गई थी. हालांकि, विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के मुताबिक, वायरस का संक्रमण इससे काफी पहले ही शुरू हो चुका था. WHO ने बताया कि कांगो में यह प्रकोप सही में फरवरी में शुरू हुआ था और कई महीनों बाद इसकी पहचान हो सकी. वहीं, WHO के अनुसार कांगो और युगांडा में इबोला के प्रकोप की पुष्टि मई में हुई थी. संक्रमण को रोकने के लिए स्वास्थ्य एजेंसियां निगरानी बढ़ाने, संक्रमित लोगों के संपर्क में आए लोगों की पहचान करने, मरीजों को इलाज और आइसोलेशन की सुविधा देने के साथ जरूरी मेडिकल सामान की उपलब्धता पर काम कर रही हैं.
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किस कारण बनी बड़ी चिंता
इबोला के इस प्रकोप को लेकर सबसे बड़ी चिंताओं में से एक यह है कि वायरस आधिकारिक तौर पर सामने आने से पहले कितने समय तक फैलता रहा. WHO के मुताबिक, फरवरी में संक्रमण शुरू होने और मई में इसकी आधिकारिक घोषणा के बीच का अंतर काफी जरूरी है. किसी भी इबोला संक्रमण को रोकने में शुरुआती पहचान बेहद जरूरी होती है. इससे संक्रमित मरीजों को समय पर अलग किया जा सकता है, उनके संपर्क में आए लोगों का पता लगाया जा सकता है और वायरस के आगे फैलने की संभावना को कम किया जा सकता है.
कांगो में 17वीं बार फैला इबोला
यह कांगो में इबोला का 17वां प्रकोप है. इबोला वायरस की पहली पहचान 1976 में इबोला नदी के पास हुई थी. मौजूदा प्रकोप को कांगो का अब तक का सबसे बड़ा इबोला आउटब्रेक बताया जा रहा है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

कांगो में इबोला से 2000 मौतें, तेजी से फैल रहा वायरस Ebola Outbreak in Congo : अफ्रीकी देश डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो में वायरस का संक्रमण तेजी से बढ़ रहा है और अब इससे होने वाली म.....

इस मौसम में भी कूलर चलाकर सोते हैं? कितनी खतरनाक हो सकती है यह आदत 11/08/2026

Sleeping With Cooler in Rainy Season: बदलते मौसम और उमस के कारण बरसात के मौसम में भी ज्यादातर लोग कूलर चालू करके ही सोते हैं. बारिश का मौसम भले ही ठंडा हो लेकिन घर के अंदर अक्सर चिपचिपाहट और उमस जैसा महसूस होने लगता है जिसपर लोग ठंडी हवा के लिए कूलर चला कर सोते हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं ये आदत आपके लिए कितनी ज्यादा नुकसानदायक हो सकती है. डॉक्टर बताते हैं कि लगातार कई घंटों तक कूलर की सीधी हवा में सोना सेहत के लिए अच्छा नहीं है. खासकर इस मौसम में जब काफी ज्यादा नमी हो. ऐसे में अगर आप भी बरसात के मौसम में कूलर चालू करके रात भर सोते हैं तो ये जानकारी आपके लिए जरूरतमंद साबित होगी, आइए जानते हैं इसके बारे में पूरी जानकारी.
सेहत पर क्या असर पड़ता है
गर्मी के मौसम में कूलर के सामने सोने के अलावा अगर इस मौसम में कूलर के आगे सोते हैं तो कूलर की ठंडी हवा से शरीर का तापमान अचानक से गिर जाता है, जिससे सर्दी जुकाम, गले में खराश, और सिर दर्द जैसी परेशानी होने लगती है. साथ ही कूलर की हवा सीधे छाती या चेहरे पर पड़े तो सांस से जुड़ी परेशानी भी बढ़ सकती है. जिन लोगों को पहले से जोड़ों में दर्द या मांसपेशियों में अकड़न की शिकायत है, उनके लिए यह आदत और भी नुकसानदायक साबित हो सकती है, क्योंकि ठंडी हवा से जोड़ों का दर्द बढ़ जाता है. इसके अलावा कूलर की हवा से त्वचा भी रूखी होने लगती है, जिससे खुजली और जलन जैसी समस्याएं हो सकती हैं.
इसके अलावा बारिश के मौसम में मच्छरों का प्रकोप भी काफी तेजी से फैल जाता है, इसके कारण अगर कूलर की अच्छी तरह सफाई न हो और पानी डाल कर इस्तेमाल किया जाए तो आपके कमरे में मच्छरों का आना कभी कम नहीं हो पाता है, जिससे मलेरिया, बच्चों में डायरिया जैसी परेशानी सामान्य हो जाती हैं. साथ ही उमस भरे मौसम में अगर पानी डाल कर कूलर चलाते हैं तो शरीर में चिपचिपाहट और स्किन एलर्जी जैसी परेशानियां भी सामान्य हो जाती हैं.
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बचाव के आसान तरीके
ऐसे में हर किसी के दिमाग में सवाल आता है कि उमस भरे मौसम में कूलर का सही उपयोग कैसे करें, ऐसे में बता दें कि सबसे पहले आपको, पूरी रात कूलर चलाने की बजाय टाइमर लगा देना चाहिए ताकि एक बार कमरा ठंडा हो जाए तो फिर वे अपने आप बंद हो जाए, इसके अलावा कूलर की हवा सीधे एकदम चेहरे पर, सिर पर या छाती पर आने से बचाएं, और कोशिश करें कि कूलर चलते समय थोड़ी सी खिड़की या दरवाजा खुला छोड़ दें, इससे पूरे कमरे में बराबर हवा फैलती है. और ज्यादातर मामलों में ध्यान देने वाली बात रहती है कि आप नियमित रूप से कूलर की सफाई करते रहें, ध्यान रखें कि उसमें लंबे समय तक पानी न जमा रहे इससे मच्छरों का प्रकोप बढ़ जाता है. इसके अलावा बच्चों को कूलर में सुलाने से पहले उन्हें हल्की चादर ओढ़ा दें जिससे उनके शरीर को सीधी हवा नहीं लगेगी, जिससे वे फैलने वाली बीमारी से बचेंगे.
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इस मौसम में भी कूलर चलाकर सोते हैं? कितनी खतरनाक हो सकती है यह आदत Sleeping With Cooler in Rainy Season: बरसात में उमस के कारण कूलर चलाना आम है, लेकिन रातभर इसकी सीधी हवा से परेशानी हो सकती है. कूलर इस्तेमाल...

डायबिटीज में अचार, पापड़ और चटनी कितनी सही? जानें एक्सपर्ट की राय 11/08/2026

Diabetes: जब भी डायबिटीज या ब्लड शुगर की बात होती है, तो लोग सबसे ज्यादा ध्यान चावल, रोटी, ब्रेड और मीठी चीजों पर देते हैं. लेकिन थाली में साथ में रखे अचार, पापड़ और चटनी की तरफ शायद ही किसी का ध्यान जाता है. ये चीजें खाने का स्वाद तो बढ़ा देती हैं, लेकिन क्या इनका असर हमारे ब्लड शुगर पर भी पड़ता है? यह सवाल बहुत लोगों के मन में आता है. इसका जवाब इतना आसान नहीं है कि इन्हें सीधे 'अच्छा' या 'बुरा' कह दिया जाए. इनका असर इस बात पर निर्भर करता है कि ये किस चीज से बने हैं, कैसे बनाए गए हैं और कितनी मात्रा में खाए जा रहे हैं.
अचार, पापड़ और चटनी का ब्लड शुगर पर असर
डाइटिशियन और डायबिटीज एक्सपर्ट कनिका मल्होत्रा बताती हैं कि इनका असर पूरी तरह इस बात पर निर्भर करता है कि कौन सा अचार या चटनी है और वह कैसे बनाई गई है. जैसे सरसों के तेल और सिरके में बना नींबू या आम का अचार खाने के बाद ब्लड शुगर को धीरे-धीरे बढ़ने में मदद कर सकता है. वहीं दही के साथ बनी धनिया या पुदीने की चटनी में बहुत कम कार्ब्स होते हैं और इसमें फाइबर तथा प्रोटीन भी मिलता है, जो अच्छा माना जाता है.
लेकिन तला हुआ पापड़ या ज्यादा चीनी वाली टमाटर की चटनी इसके उलट काम करती है. ये चीजें शरीर में ज्यादा कार्ब्स और तेल पहुंचाती हैं, जिससे ब्लड शुगर तेजी से बढ़ सकता है. एक्सपर्ट का कहना है कि ये चीजें थाली में सिर्फ स्वाद के लिए नहीं होतीं, बल्कि इनका असर सेहत पर भी पड़ता है. अकेले खाने पर इनका असर भले ही कम लगे, लेकिन जब कई चीजें एक साथ खाई जाएं, तो इनका असर बढ़ जाता है.
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कौन सी चीजें बेहतर होती हैं और क्यों
एक्सपर्ट के मुताबिक, सिरके और फर्मेंटेशन से बनी चीजें खाना पचने की रफ्तार को धीमा कर देती हैं, जिससे शुगर धीरे-धीरे बढ़ता है. नारियल, तिल या हरी सब्जियों से बनी चटनी भी शरीर में कार्ब्स के अवशोषण को धीमा करती है. सरसों, मेथी और अजवाइन जैसे मसाले भी शरीर में इंसुलिन को बेहतर तरीके से काम करने में मदद करते हैं. वहीं दही जैसी चीजें, जिनमें फैट और प्रोटीन होता है, वे भी खाना पचने की रफ्तार धीमी करती हैं.
लेकिन तले हुए पापड़ के साथ ऐसा नहीं होता. तलने की प्रक्रिया में तेल की मात्रा बढ़ जाती है, जिससे उड़द या मूंग से बने पापड़ का असर भी बदल जाता है और यह ब्लड शुगर को तेजी से बढ़ा सकता है. एक्सपर्ट यह भी बताती हैं कि बाजार में मिलने वाले पैकेट के अचार और चटनी में अक्सर ज्यादा नमक, प्रिज़र्वेटिव और छिपी हुई चीनी होती है, जो सेहत के लिए अच्छी नहीं मानी जाती. यानी असली फर्क इस बात से पड़ता है कि चीज कैसे बनाई गई है, न कि सिर्फ इस बात से कि वह अचार है, पापड़ है या चटनी.
इन्हें खाने का सही तरीका क्या है
एक्सपर्ट के मुताबिक सबसे सही तरीका यह है कि अचार, पापड़ और चटनी को बहुत कम मात्रा में खाया जाए. जहां तक हो सके, ताजी बनी चटनी को चुनें, तले हुए पापड़ की जगह भुना हुआ पापड़ खाएं, और नमक तथा चीनी की मात्रा का हमेशा ध्यान रखें. इन्हें पूरी तरह छोड़ने की जरूरत नहीं है, बस समझदारी से और सही मात्रा में खाना ही सबसे अच्छा तरीका है.
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.
यह भी पढ़ें: Gut Bacteria species: भारतीय जनजातियों में मिले 14 नए बैक्टीरिया, क्यों खास है खोज

डायबिटीज में अचार, पापड़ और चटनी कितनी सही? जानें एक्सपर्ट की राय Diabetes: डायबिटीज में अचार, पापड़ और चटनी खाना कितना सही है? जानें इनका ब्लड शुगर पर क्या असर पड़ता है, कौन से विकल्प बेहत....

ब्रेस्ट पंप या डायरेक्ट फीडिंग? जानिए आपके बच्चे के लिए क्या है बेहतर 11/08/2026

Breast Pumping vs Breastfeeding: नवजात शिशु के जन्म के बाद हर मां के मन में सबसे बड़ा सवाल उसके पोषण को लेकर होता है. डॉक्टरों का मानना है कि बच्चे के शुरुआती 6 महीनों के लिए मां का दूध अमृत समान है. हालांकि, बदलते समय और बदलती लाइफस्टाइल के साथ अब दूध पिलाने के तरीकों में भी बदलाव आया है.
आजकल कामकाजी और व्यस्त माताएं सीधे स्तनपान कराने के बजाय ब्रेस्ट पंप की मदद से दूध निकालकर बोतल या चम्मच से बच्चे को पिला रही हैं, लेकिन क्या इन दोनों तरीकों में कोई अंतर है? आइए जानते हैं कि आपके बच्चे के लिए इन दोनों में से कौन सा तरीका सबसे बेस्ट है.
ब्रेस्ट पंपिंग को लेकर चिंता क्या?
विशेषज्ञों का मानना है कि आज स्तनपान को केवल मां का दूध पिलाना मान लिया गया है और ब्रेस्ट पंपिंग को स्तनपान के बराबर समझा जा रहा है. हालांकि, ऐसा करने से मां और बच्चे के बीच का अनोखा और प्राकृतिक रिश्ता कमजोर पड़ सकता है. पंपिंग एक जरूरी जरिया तो है, पर यह सीधे स्तनपान की जगह कभी नहीं ले सकता. विशेषज्ञों का कहना है कि माताओं को मशीनों या तकनीक के बजाय सही मदद और सहयोग की ज्यादा जरूरत है. अगर ऑफिसों में रूल्स हों, मैटरनिटी लीव मिले और स्तनपान के लिए सही गाइडेंस मिले तो महिलाओं को बार-बार पंप से दूध निकालने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी.
ब्रेस्ट फीडिंग के कई फायदे
डॉक्टरों के अनुसार, स्तनपान सिर्फ बच्चे का पेट भरने के लिए नहीं है. यह बच्चे को बीमारियों से लड़ने की ताकत देता है और उसके पेट को स्वस्थ रखता है. शुरुआती दो सालों में यह बच्चे के पूरे पाचन तंत्र को मजबूत करने का काम करता है. साथ ही कई रिसर्च में पता चला है कि सीधा स्तनपान कराने से बच्चे का दिमाग तेज होता है, उसका मेटाबॉलिज्म सुधरता है और बचपन में मोटापे का खतरा भी काफी कम हो जाता है.
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ब्रेस्ट पंप इस्तेमाल करने का सही तरीका
डॉक्टरों के मुताबिक, अगर ब्रेस्ट पंप का इस्तेमाल करना जरूरी हो तो ऐसे मे साफ-सफाई का पूरा ध्यान रखना चाहिए. महिलाओं को पंप के उपकरणों को ठीक से साफ करना, उन्हें सैनेटाइज करना और निकाले गए दूध को सुरक्षित रखना जरूर सीखना चाहिए. साथ ही डॉक्टर दूध पिलाने के तरीके को लेकर भी सावधानी बरतने की सलाह दी है. जहां तक हो सके, बच्चे को बोतल के बजाय चम्मच या कप से दूध पिलाना बेहतर होता है. बोतल से दूध पीने पर कुछ बच्चे निप्पल कन्फ्यूजन का शिकार हो सकते हैं, जिससे बाद में उनके लिए मां का दूध सीधे पीना मुश्किल हो जाता है.
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.
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ब्रेस्ट पंप या डायरेक्ट फीडिंग? जानिए आपके बच्चे के लिए क्या है बेहतर Breast Pumping vs Breastfeeding: डॉक्टरों के मुताबिक, कुछ खास हालातों में ब्रेस्ट पंप का इस्तेमाल करना चाहिए.जो माताएं और बच्चे पूरी त.....

बच्चों के खाने पर FSSAI का नया फॉर्मूला, हाई शुगर-फैट और सॉल्ट पर तय होगी लिमिट 11/08/2026

स्कूल की कैंटीन में बच्चा रोज समोसा, चिप्स, बिस्किट या कोई ठंडी ड्रिंक खरीदता है, लेकिन सवाल यह है कि इनमें से कितना खाना बच्चों के लिए ज्यादा नुकसानदेह है? अब इसका जवाब सिर्फ अंदाजे से नहीं बल्कि तय आंकड़ों के आधार पर देने की तैयारी है. भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण यानी FSSAI ने स्कूली बच्चों के खाने को लेकर नए नियमों का ड्राफ्ट जारी किया है. इसमें पहली बार यह तय करने की कोशिश की गई है कि किसी खाने में कितनी ज्यादा चीनी, फैट या नमक होने पर उसे ‘हाई शुगर’, ‘हाई फैट’ या ‘हाई सॉल्ट’ माना जाए.
बच्चे की कैंटीन में मिलने वाले खाने पर क्यों उठ रहा सवाल?
बच्चे स्कूल में दिन का काफी समय बिताते हैं. ऐसे में स्कूल की कैंटीन में उन्हें क्या खाने को मिल रहा है, इसका सीधा असर उनकी खान-पान की आदतों पर पड़ सकता है. अभी स्कूल के अंदर और स्कूल के गेट से 50 मीटर के दायरे में ज्यादा फैट, चीनी और नमक वाले खाने की बिक्री और विज्ञापन पर रोक है लेकिन एक बड़ी परेशानी थी कि यह साफ नहीं था कि आखिर किस खाने को ‘ज्यादा फैट, ज्यादा चीनी या ज्यादा नमक वाला’ माना जाए. FSSAI का नया ड्राफ्ट इसी कमी को दूर करने की कोशिश है.
100 ग्राम खाने में 3 ग्राम से ज्यादा चीनी तो ‘हाई शुगर’
प्रस्ताव के मुताबिक, अगर किसी ठोस खाने में 100 ग्राम पर 3 ग्राम से ज्यादा अतिरिक्त चीनी है तो उसे हाई शुगर माना जाएगा. इसी तरह 100 ग्राम खाने में 4.2 ग्राम से ज्यादा अतिरिक्त फैट होने पर वह हाई फैट और 0.625 ग्राम से ज्यादा नमक होने पर हाई सॉल्ट की श्रेणी में आएगा. बच्चों की पसंद वाली ड्रिंक्स के लिए भी अलग सीमा रखी गई है. इसमें 100 मिलीलीटर में 2 ग्राम से ज्यादा अतिरिक्त चीनी, 1.5 ग्राम से ज्यादा फैट और 0.175 ग्राम से ज्यादा नमक होने पर वह संबंधित हाई कैटेगरी में आएगी. मतलब बच्चों के खाने की जांच अब इन नंबर्स से होगी.
सीधे शब्दों में समझें तो अब किसी खाने को सिर्फ इसलिए अनहेल्दी नहीं कहा जाएगा कि उसमें चीनी या नमक ज्यादा लगता है. प्रस्तावित नियमों में इसके लिए एक तय पैमाना होगा. इससे स्कूलों में बिकने वाले खाने की निगरानी और नियमों को लागू करना आसान हो सकता है. FSSAI का कहना है कि ये सीमाएं ICMR की 2024 की भारतीयों के लिए डाइटरी गाइडलाइंस को ध्यान में रखकर तय की गई हैं.
बच्चों में बढ़ता मोटापा भी बड़ी चिंता
इस पूरे कदम के पीछे बच्चों में बढ़ते ज्यादा वजन और मोटापे की चिंता भी है. World Obesity Atlas 2026 के मुताबिक, भारत में करीब 4.1 करोड़ बच्चे ज्यादा वजन या मोटापे की समस्या से प्रभावित हैं. यानी मामला सिर्फ स्कूल की कैंटीन तक सीमित नहीं है। बच्चों की खाने की आदतें और उनकी सेहत को लेकर चिंता लगातार बढ़ रही है. जुलाई में ICMR के राष्ट्रीय पोषण संस्थान की अगुवाई वाली ‘Let's Fix Our Food’ पहल में भी स्कूलों में मिलने वाले खाने, विज्ञापन, लेबलिंग और टैक्स से जुड़े नियमों को मजबूत करने की जरूरत बताई गई थी.
महाराष्ट्र में भी स्कूलों में खाने को लेकर सख्ती
महाराष्ट्र में पिछले महीने स्कूलों में ऐसे खाने को लेकर आदेश जारी किया गया था. इसके तहत स्कूल के अंदर और स्कूल परिसर से 50 मीटर के दायरे में ज्यादा फैट, चीनी और नमक वाले खाने की बिक्री, मुफ्त वितरण और विज्ञापन पर रोक लगाई गई थी. साथ ही स्कूल कैंटीन के लिए FSSAI लाइसेंस या रजिस्ट्रेशन भी जरूरी किया गया है. यह आदेश राज्य के करीब 1.08 लाख स्कूलों पर लागू होता है.
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नमक और सोडियम को लेकर भी उठ सकता है सवाल
ड्राफ्ट में एक तकनीकी सवाल भी है. शुरुआत में ज्यादा सोडियम की बात की गई है जबकि आगे इसकी सीमा नमक के आधार पर बताई गई है. दोनों एक चीज नहीं हैं. नमक में करीब 40 फीसदी सोडियम होता है. ऐसे में ड्राफ्ट पर मिलने वाले सुझावों में इस अंतर को लेकर भी सवाल उठ सकता है.
अभी माता-पिता को क्या समझना चाहिए?
सबसे जरूरी बात यह है कि FSSAI का यह अभी सिर्फ ड्राफ्ट है. यानी फिलहाल स्कूलों में कोई नया नियम लागू नहीं हुआ है. राजपत्र में ड्राफ्ट प्रकाशित होने के बाद लोगों से आपत्ति और सुझाव मांगे गए हैं. इसके लिए 60 दिन का समय दिया गया है. अगर यह प्रस्ताव आगे लागू होता है तो स्कूलों में बच्चों को मिलने वाले खाने की निगरानी के लिए एक स्पष्ट पैमाना मिल सकता है.
पैकेट वाले खाने की लेबलिंग का मामला अलग
इसी दौरान पैकेट वाले खाने की लेबलिंग को लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक अलग मामला चल रहा है. इसमें FSSAI ने 3 अगस्त को हलफनामा दाखिल कर पैकेट पर चेतावनी वाले निशान की जगह न्यूट्रिशन टेबल देने की बात कही है, लेकिन स्कूलों में बच्चों के लिए हाई फैट, हाई शुगर और हाई सॉल्ट खाने की सीमा तय करने वाला यह ड्राफ्ट उस मामले से अलग है.
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बच्चों के खाने पर FSSAI का नया फॉर्मूला, हाई शुगर-फैट और सॉल्ट पर तय होगी लिमिट FSSAI प्रस्ताव के मुताबिक, 100 ग्राम पर 3 ग्राम से ज्यादा चीनी है तो उसे हाई शुगर माना जाएगा. इसी तरह 100 ग्राम खाने में 4.2 ग्र.....

5 साल से पानी में रह रहा लड़का, बाहर निकलते ही होती है जलन; ये कौन-सी बीमारी? 11/08/2026

Skin Itch After Bathing: पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद का एक लड़का अपना अधिकांश समय तालाब में बिताता है. यह चीज वह करीब 5 साल से करता आ रहा है, जब भी वह पानी से बाहर निकलता है, शरीर पर तेज जलन और बैचेनी होने लगती है और पानी में जाते ही उसे सुकून और राहत मिलती है. डॉक्टरों के मुताबिक, इस परेशानी के पीछे 'एक्वाजेनिक प्रुरिटस' नामक एक दुर्लभ बीमारी हो सकती है.
यह एक अनोखी बीमारी है. इस बमारी में पानी के संपर्क में आने के बाद शरीर में तेज खुजली, चुभन, जलन या दर्द होने लगता है. इस बीमारी को पहचानना इसलिए बहुत कठिन है क्योंकि इतनी तेज तकलीफ होने के बावजूद त्वचा ऊपर से बिल्कुल सामान्य दिखती है.
एक्वाजेनिक प्रुरिटस क्या है?
एक्वाजेनिक प्रुरिटस एक दुर्लभ बीमारी है. पुणे की त्वचा विशेषज्ञ डॉ. कृतिका शर्मा का मानना है कि एक्वाजेनिक प्रुरिटस के बारे में सबसे उलझाने वाली बात यह है कि त्वचा ऊपर से बिल्कुल साफ और सामान्य दिखती है, फिर भी मरीज को बहुत तेज तकलीफ होती है. आम एलर्जी की तरह यह जरूरी नहीं कि पानी में मिली किसी खराबी या केमिकल के कारण ही हो, बल्कि यह सामान्य पानी से भी हो सकती है.
जलन क्यों होती है?
डॉक्टरों के पास अभी तक इस बात का कोई पक्का जवाब नहीं है कि यह बीमारी क्यों होती है. वैज्ञानिकों का मानना है कि पानी के संपर्क में आते ही त्वचा की नसें एक अजीब तरह से काम करने लगती हैं, जिससे तेज खुजली, चुभन या जलन महसूस होने लगती है. यह समस्या किसी भी तरह के पानी और किसी भी तापमान के पानी से हो सकती है. इसका मतलब है कि ठंडे पानी के बदले गर्म पानी से नहाने से भी इस बीमारी में कोई आराम नहीं मिलता. इस बीमारी में त्वचा पर पानी पड़ते ही तकलीफ तो शुरू हो जाती है, लेकिन इसमें आम एलर्जी की तरह त्वचा पर कोई लक्षण नहीं दिखते.
क्या यह किसी और बीमारी का संकेत है?
कभी भी पानी से होने वाली लगातार खुजली को सिर्फ सूखी त्वचा समझकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. एक्वाजेनिक प्रुरिटस अपने आप भी हो सकता है, लेकिन कभी-कभी यह खून की कुछ बीमारियों जैसे पॉलीसिथेमिया वेरा से भी जुड़ा होता है. इसका यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि पानी से खुजली महसूस करने वाले हर इंसान को खून की कोई गंभीर बीमारी हो. ऐसे में डॉक्टर मरीज के लक्षणों, उसकी पुरानी सेहत और जांच के आधार पर ही आगे के टेस्ट कराने की सलाह देते हैं. डॉ. कृतिका ने कहा, पानी से होने वाली खुजली का यह मतलब नहीं है कि शरीर के अंदर कोई गंभीर बीमारी छुपी हुई है.
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क्या इसका इलाज संभव है
एक्वाजेनिक प्रुरिटस से पीड़ित सभी मरीजों के लिए कोई एक इलाज काम नहीं करता है. तकलीफ कितनी गंभीर है और इसके पीछे कोई और बीमारी तो नहीं है, यह जानने के बाद ही डॉक्टर इलाज के अलग-अलग तरीके अपनाते हैं. इलाज का मुख्य मकसद इस तकलीफ और जलन को कम करना होता है. इसके साथ ही, अगर जांच में कोई दूसरी बीमारी सामने आती है, तो उसका इलाज भी जरूरी हो जाता है. चूंकि यह बीमारी बहुत कम लोगों को होती है और हर मरीज में इसके लक्षण अलग हो सकते हैं, इसलिए इसका इलाज भी हर व्यक्ति के हिसाब से अलग-अलग किया जाता है.
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5 साल से पानी में रह रहा लड़का, बाहर निकलते ही होती है जलन; ये कौन-सी बीमारी? Skin Itch After Bathing: 5 साल से एक लड़का पानी से आराम से नहाता है, लेकिन अब नहाने पर उसके शरीर में जलन होने लगती है. आइए डॉक्टर्स से ....

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