Ramkumar
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20/08/2026
त्रेतायुग का समय था। वनवास के दिनों में श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण पंचवटी के सुंदर वन में एक कुटिया बनाकर रह रहे थे। चारों ओर घना जंगल था, पेड़ों पर पक्षियों की मधुर आवाजें सुनाई देती थीं और गोदावरी नदी की धारा वातावरण को शांत बनाए रखती थी। लेकिन उसी वन में एक ऐसा षड्यंत्र जन्म ले चुका था, जो आगे चलकर पूरी रामायण की दिशा बदलने वाला था। लंकापति रावण ने छलपूर्वक माता सीता का हरण करने की योजना बनाई और अवसर पाकर वह माता सीता को अपने साथ आकाश मार्ग से लंका की ओर ले जाने लगा। माता सीता लगातार श्रीराम और लक्ष्मण को पुकार रही थीं और रावण से उन्हें छोड़ देने की प्रार्थना कर रही थीं, लेकिन रावण अपने अहंकार में डूबा हुआ था। उसे लगता था कि अब उसे रोकने वाला कोई नहीं है।
रावण आकाश मार्ग से आगे बढ़ ही रहा था कि अचानक उसकी गति को किसी ने चुनौती दी। एक विशाल पक्षी आकाश में उसके सामने आकर खड़ा हो गया। उसके पंख वृद्धावस्था के कारण पहले जैसे शक्तिशाली नहीं थे, शरीर भी कमजोर हो चुका था, लेकिन उसकी आंखों में अद्भुत तेज था। वह थे पक्षीराज जटायु। जटायु कोई साधारण पक्षी नहीं थे। वे अरुणदेव के पुत्र और संपाति के भाई थे तथा उनका संबंध अयोध्या के महाराज दशरथ से भी था। वृद्ध होने के बावजूद उनके हृदय में धर्म और साहस की शक्ति आज भी उतनी ही प्रबल थी। जैसे ही उनकी नजर माता सीता पर पड़ी, उन्हें समझते देर नहीं लगी कि रावण कोई साधारण यात्रा नहीं कर रहा, बल्कि अधर्मपूर्वक माता सीता को अपने साथ ले जा रहा है।
जटायु ने रावण का मार्ग रोकते हुए गर्जना की, हे रावण, ठहर जा। तू कौन है और इस देवी को इस प्रकार बलपूर्वक कहां लेकर जा रहा है? माता सीता ने जटायु को देखा तो उनके भीतर आशा की एक किरण जाग उठी। उन्होंने कहा, हे पक्षीराज, मैं अयोध्या के श्रीराम की पत्नी सीता हूं। यह राक्षसराज रावण छलपूर्वक मेरा हरण करके मुझे लंका ले जा रहा है। यदि तुम श्रीराम को जानते हो तो मेरी रक्षा करो। जटायु ने माता सीता को आश्वासन देते हुए कहा, माता, जब तक मेरे शरीर में प्राण हैं, मैं आपको इस अधर्मी के हाथों नहीं जाने दूंगा। रावण ने जटायु की बात सुनकर उपहास किया और कहा, वृद्ध पक्षी, अपनी आयु देख। तू मेरा मार्ग रोकने का साहस कैसे कर रहा है? मैं लंका का राजा रावण हूं। मेरे सामने बड़े-बड़े योद्धा टिक नहीं पाते और तू मुझे रोकने चला है।
जटायु ने रावण के अहंकार का उत्तर देते हुए कहा, रावण, शक्ति का घमंड करने से कोई महान नहीं बन जाता। सच्ची शक्ति वही है जिसका उपयोग धर्म की रक्षा के लिए किया जाए। किसी दूसरे की पत्नी का हरण करना वीरता नहीं, अधर्म है। यदि तुझमें थोड़ा भी साहस है तो माता सीता को यहीं छोड़ दे और वापस लौट जा। रावण क्रोध से भर उठा। उसने जटायु को हटने का आदेश दिया, लेकिन जटायु तनिक भी पीछे नहीं हटे। उन्होंने कहा, मैं जानता हूं कि मैं वृद्ध हूं। मैं यह भी जानता हूं कि तुम शक्तिशाली हो। लेकिन मेरे सामने आज मेरी आयु नहीं, मेरा धर्म खड़ा है। मैं अपनी आंखों के सामने माता सीता को अधर्म के हाथों जाते हुए नहीं देख सकता।
इसके बाद आकाश में रावण और जटायु के बीच भयंकर संघर्ष शुरू हो गया। रावण ने अपने अस्त्र-शस्त्रों का प्रयोग किया, लेकिन जटायु ने अद्भुत पराक्रम दिखाते हुए उसका सामना किया। उन्होंने रावण के रथ को रोकने का प्रयास किया और उसके मार्ग में बार-बार बाधा डाली। जटायु ने अपने विशाल पंखों से ऐसा प्रहार किया कि रावण को कुछ समय के लिए संभलना मुश्किल हो गया। माता सीता यह दृश्य देखकर आशा से भर उठीं। उन्हें लगा कि शायद जटायु उन्हें रावण के चंगुल से बचा लेंगे। जटायु ने पूरी शक्ति से युद्ध किया और रावण के रथ को भारी क्षति पहुंचाई। रावण के घोड़े और रथ अस्त-व्यस्त हो गए और कुछ समय के लिए उसका मार्ग रुक गया।
लेकिन रावण भी अत्यंत शक्तिशाली योद्धा था। उसने क्रोध में आकर जटायु पर लगातार प्रहार किए। वृद्ध शरीर होने के कारण जटायु धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगे, फिर भी उन्होंने हार नहीं मानी। उनके मन में केवल एक ही विचार था कि किसी भी कीमत पर माता सीता की रक्षा करनी है। रावण ने अंततः एक शक्तिशाली अस्त्र से जटायु को गंभीर रूप से घायल कर दिया। जटायु धरती की ओर गिरने लगे। माता सीता की आंखों से आंसू बहने लगे। उन्होंने जटायु को देखकर कहा, हे पक्षीराज, आपने मेरे लिए अपने प्राणों की चिंता तक नहीं की। कृपया श्रीराम को मेरे बारे में अवश्य बताइएगा। जटायु ने अपनी बची हुई शक्ति से माता सीता को आश्वासन दिया कि वे श्रीराम तक यह संदेश पहुंचाने का प्रयास करेंगे।
रावण माता सीता को लेकर आगे बढ़ गया और कुछ ही समय बाद उसकी आंखों से जटायु ओझल हो गए। लेकिन जटायु का शरीर धरती पर पड़ा था और उनके भीतर अभी भी प्राण शेष थे। वह जानते थे कि शायद उनका समय पूरा होने वाला है, लेकिन उनके मन में एक ही इच्छा थी कि श्रीराम को माता सीता के बारे में बता दें। वह वहीं पड़े-पड़े श्रीराम के आने की प्रतीक्षा करने लगे। उधर पंचवटी में लौटकर श्रीराम और लक्ष्मण ने जब माता सीता को कुटिया में नहीं पाया तो दोनों उन्हें खोजने के लिए वन में निकल पड़े। श्रीराम की चिंता बढ़ती जा रही थी। वे पेड़ों, लताओं, नदियों और वन के जीव-जंतुओं से माता सीता के बारे में पूछते हुए आगे बढ़ रहे थे।
कुछ दूर जाने पर उन्हें वन में संघर्ष के चिन्ह दिखाई दिए। टूटा हुआ रथ, बिखरे हुए अस्त्र और धरती पर पड़े पंखों को देखकर श्रीराम समझ गए कि यहां कोई भयंकर संघर्ष हुआ है। आगे बढ़ने पर उनकी नजर एक विशाल घायल पक्षी पर पड़ी। श्रीराम ने पहले सोचा कि शायद यही कोई ऐसा प्राणी है जिसने माता सीता के साथ कुछ किया हो, लेकिन जब जटायु ने श्रीराम का नाम लिया तो सब कुछ स्पष्ट हो गया। जटायु ने कमजोर आवाज में कहा, राम... मैं जटायु हूं। श्रीराम तुरंत उनके पास बैठ गए। उन्होंने जटायु का सिर अपने हाथों में लिया और पूछा, हे पक्षीराज, माता सीता कहां हैं? किसने उन्हें यहां से ले गया?
जटायु ने अपनी अंतिम शक्ति जुटाई और कहा, राम, रावण... लंका का राजा रावण माता सीता का हरण करके ले गया है। वह उन्हें दक्षिण दिशा की ओर लेकर गया है। मैंने उसे रोकने का पूरा प्रयास किया। मैंने उसके रथ को रोका और माता सीता को बचाने के लिए उससे युद्ध किया, लेकिन मेरी आयु और शरीर ने मेरा साथ नहीं दिया। श्रीराम की आंखों में आंसू आ गए। उन्होंने जटायु को अपनी गोद में उठा लिया और कहा, हे तात, आपने माता सीता की रक्षा के लिए जो किया है, वह संसार में कोई साधारण कार्य नहीं है। आपने अपने प्राणों की चिंता किए बिना धर्म के लिए युद्ध किया। आप मेरे लिए पिता के समान हैं।
जटायु ने श्रीराम की ओर देखा। उनके चेहरे पर संतोष था। उन्होंने कहा, प्रभु, मुझे दुख केवल इस बात का है कि मैं माता सीता को बचा नहीं पाया। श्रीराम ने तुरंत कहा, नहीं तात, ऐसा मत कहिए। आपने अपना कर्तव्य पूरी निष्ठा से निभाया है। जिस समय संसार में कोई भी वहां नहीं था, उस समय आपने अकेले रावण का सामना किया। माता सीता की रक्षा के लिए आपने अपने प्राणों की बाजी लगा दी। आपके इस त्याग को मैं कभी नहीं भूल सकता। जटायु की आंखों में आंसू आ गए। उन्होंने श्रीराम का नाम लिया और उनकी गोद में ही अपने प्राण त्याग दिए।
जटायु के प्राण निकलते ही वन का वातावरण जैसे शांत हो गया। श्रीराम कुछ क्षण तक उन्हें अपनी गोद में लिए बैठे रहे। उनकी आंखों से आंसू बह रहे थे। लक्ष्मण भी यह दृश्य देखकर भावुक हो गए। श्रीराम ने कहा, लक्ष्मण, आज मैंने अपने पिता के समान एक प्रियजन को खो दिया है। जटायु ने मेरे लिए वह किया जो शायद कोई अपना भी न कर पाता। उन्होंने मेरे परिवार की रक्षा के लिए अपने प्राण दे दिए। इसके बाद श्रीराम ने स्वयं जटायु का अंतिम संस्कार करने का निर्णय लिया। उन्होंने उन्हें वही सम्मान दिया जो एक पुत्र अपने पिता को देता है। श्रीराम के हाथों से जटायु का अंतिम संस्कार हुआ और उन्होंने उन्हें भावपूर्ण श्रद्धांजलि दी।
जटायु की कथा केवल एक पक्षी और एक राक्षस के युद्ध की कथा नहीं है। यह उस साहस की कथा है जिसमें जीत से अधिक महत्वपूर्ण कर्तव्य होता है। जटायु जानते थे कि रावण उनसे कहीं अधिक शक्तिशाली है। वे यह भी जानते थे कि उनकी आयु बहुत अधिक हो चुकी है और उनका शरीर पहले जैसा बलवान नहीं रहा। फिर भी जब उन्होंने माता सीता को संकट में देखा तो उन्होंने अपनी जान की परवाह नहीं की। उन्होंने यह नहीं सोचा कि मैं जीत पाऊंगा या नहीं। उन्होंने केवल यह सोचा कि मेरे सामने अधर्म हो रहा है और मुझे इसे रोकने का प्रयास करना ही होगा।
यही कारण है कि श्रीराम ने जटायु को केवल एक पक्षी नहीं माना। उन्होंने उन्हें पिता के समान सम्मान दिया। जटायु ने अपने जीवन के अंतिम क्षणों में यह सिद्ध कर दिया कि धर्म की रक्षा करने के लिए शरीर की शक्ति नहीं, बल्कि मन का साहस आवश्यक होता है। उनका शरीर वृद्ध था, लेकिन उनका हृदय किसी महान योद्धा से कम नहीं था। उन्होंने अपने प्राण देकर यह संदेश दिया कि जब किसी निर्दोष पर संकट आए तो अपनी सामर्थ्य के अनुसार उसके लिए खड़ा होना ही सच्चा धर्म है।
जटायु की कहानी हमें यह भी सिखाती है कि भगवान के भक्त के लिए केवल पूजा और प्रार्थना ही पर्याप्त नहीं होती। जब धर्म और सत्य की रक्षा का समय आए, तब अपने कर्मों से भी धर्म का साथ देना पड़ता है। जटायु ने श्रीराम का नाम केवल सुना नहीं था, उन्होंने श्रीराम के परिवार की रक्षा करने के लिए अपने जीवन का अंतिम क्षण तक उपयोग किया। इसलिए श्रीराम ने भी उनके त्याग को अपने हृदय में स्थान दिया। रावण माता सीता को लंका ले जाने में सफल हो गया, लेकिन जटायु का साहस अधर्म के सामने अमर हो गया।
आज भी जब रामायण में जटायु का नाम लिया जाता है तो उनके साथ केवल एक पक्षी की छवि नहीं आती, बल्कि त्याग, साहस, निष्ठा और धर्म की रक्षा की भावना सामने आती है। जटायु ने यह दिखा दिया कि उम्र चाहे कितनी भी हो, परिस्थितियां चाहे कितनी भी कठिन हों और सामने वाला कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, यदि सामने अन्याय हो तो सत्य के पक्ष में खड़ा होना ही सबसे बड़ा पराक्रम है। उन्होंने माता सीता को बचाने के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी और बदले में श्रीराम की गोद में अंतिम सांस लेकर ऐसा सम्मान पाया जिसे युगों तक याद किया जाएगा। इसलिए जटायु केवल रामायण के एक पात्र नहीं हैं, बल्कि धर्म के लिए अपना सर्वस्व समर्पित करने वाले अमर वीर हैं। जय श्रीराम।
20/08/2026
राधा-राधा जो जपे, टले सकल दुख-द्वंद।
उर में बसे निज प्रेम के, पूरन परमानंद॥
20/08/2026
राम काज बिन विश्राम नहिं, यह साचा व्रत धारि।
भक्त-सिरोमणि चरण में, बलि-बलि जाऊँ वारि॥
19/08/2026
लंका युद्ध अपने चरम पर था। चारों ओर शंखनाद, युद्ध की गर्जना और अस्त्र-शस्त्रों की टकराहट से पूरी धरती कांप रही थी। श्रीराम की वानर सेना एक ओर धर्म की रक्षा के लिए लड़ रही थी, तो दूसरी ओर रावण अपनी पूरी शक्ति के साथ युद्ध में डटा हुआ था। इसी बीच रावण को अपने सबसे बड़े संकट का एहसास होने लगा। उसके शक्तिशाली योद्धा एक-एक करके पराजित हो रहे थे। कुंभकरण का अंत हो चुका था और मेघनाथ भी युद्धभूमि में मारा जा चुका था। अब रावण के मन में भय बढ़ने लगा था कि कहीं लंका का राजवंश ही समाप्त न हो जाए। तभी उसे अपने मायावी भाई अहिरावण की याद आई, जो पाताल लोक का शक्तिशाली राजा था और तंत्र-मंत्र तथा मायावी शक्तियों का महान ज्ञाता माना जाता था। रावण ने अहिरावण को बुलाकर कहा कि अब केवल उसकी माया ही श्रीराम और लक्ष्मण को रोक सकती है। अहिरावण ने अपने भाई को आश्वासन दिया कि वह किसी भी तरह श्रीराम और लक्ष्मण को पाताल लोक ले जाएगा।
रात का समय था। पूरी वानर सेना दिनभर के युद्ध के बाद विश्राम कर रही थी। श्रीराम और लक्ष्मण की रक्षा के लिए हनुमान जी स्वयं उनके पास पहरा दे रहे थे। उनकी विशाल पूंछ से उन्होंने ऐसा सुरक्षा घेरा बना रखा था कि कोई भी भीतर प्रवेश न कर सके। लेकिन अहिरावण कोई साधारण योद्धा नहीं था। उसने अपनी मायावी शक्तियों से ऐसा रूप धारण किया कि पहरे पर मौजूद वानर योद्धाओं को कुछ भी समझ नहीं आया। धीरे-धीरे वह श्रीराम और लक्ष्मण के पास पहुंचा और अपनी माया से दोनों भाइयों को मूर्छित कर दिया। इसके बाद वह उन्हें उठाकर गुप्त मार्ग से पाताल लोक ले गया। जब हनुमान जी को इस छल का पता चला तो उनका क्रोध भयंकर रूप धारण कर गया। उन्होंने तुरंत श्रीराम और लक्ष्मण को खोजने का संकल्प लिया और मायावी मार्ग से पाताल लोक की ओर प्रस्थान कर गए।
पाताल लोक का वातावरण अत्यंत रहस्यमय था। चारों ओर घना अंधकार, विशाल चट्टानें, विचित्र जीव और असुरों की भयानक आवाजें सुनाई दे रही थीं। हनुमान जी जैसे-जैसे आगे बढ़ रहे थे, वैसे-वैसे उन्हें अहिरावण के महल का रास्ता दिखाई देने लगा। लेकिन पाताल लोक के मुख्य द्वार पर पहुंचते ही उनके सामने एक विशाल और पराक्रमी योद्धा आ खड़ा हुआ। उसका शरीर आधा वानर और आधा मकर जैसा दिखाई देता था। उसकी आंखों में तेज था और उसके हाथों में विशाल गदा थी। उसने हनुमान जी का रास्ता रोकते हुए कहा कि बिना अनुमति कोई भी पाताल के भीतर प्रवेश नहीं कर सकता। हनुमान जी ने उसे समझाया कि वे अपने प्रभु श्रीराम और लक्ष्मण की खोज में आए हैं, इसलिए उन्हें तुरंत रास्ता दिया जाए। लेकिन वह योद्धा अपने कर्तव्य से पीछे हटने को तैयार नहीं हुआ।
हनुमान जी ने आश्चर्य से पूछा कि आखिर तुम कौन हो जो मेरा रास्ता रोक रहे हो? उस योद्धा ने गर्व से अपना नाम बताया, मकरध्वज। उसने कहा कि वह पाताल लोक का द्वारपाल है और अहिरावण के आदेश के बिना किसी को अंदर जाने नहीं देगा। हनुमान जी ने उसे समझाने की बहुत कोशिश की, लेकिन मकरध्वज अपने कर्तव्य पर अडिग रहा। आखिरकार दोनों के बीच युद्ध शुरू हो गया। मकरध्वज ने अपनी पूरी शक्ति से हनुमान जी पर प्रहार किया। हनुमान जी ने भी उसके पराक्रम को देखकर आश्चर्य किया। एक साधारण द्वारपाल में इतनी शक्ति होना उनके लिए भी असामान्य बात थी। दोनों के बीच लंबे समय तक संघर्ष चलता रहा। अंत में हनुमान जी ने अपनी शक्ति से मकरध्वज को परास्त कर दिया और उसे बिना कोई गंभीर चोट पहुंचाए सुरक्षित रूप से बांध दिया।
लेकिन हनुमान जी के मन में अब भी एक प्रश्न था। आखिर यह योद्धा कौन था? तभी इस रहस्य के पीछे छिपी अद्भुत कथा सामने आई। मान्यता के अनुसार, जब हनुमान जी ने लंका में प्रवेश करके रावण की सोने की नगरी को अपनी पूंछ की अग्नि से जला दिया था, तब अग्नि की तपिश शांत करने के लिए उन्होंने समुद्र में छलांग लगाई थी। समुद्र से बाहर निकलते समय उनके शरीर से पसीने की एक दिव्य बूंद समुद्र में गिर गई। उसी समय एक मकरी ने उस बूंद को ग्रहण कर लिया। वह मकरी वास्तव में एक श्रापित दिव्य स्त्री थी, जो किसी श्राप के कारण मकरी के रूप में रह रही थी। उस दिव्य बूंद के प्रभाव से उसके गर्भ से एक अद्भुत बालक ने जन्म लिया, जिसका शरीर वानर और मकर के गुणों से युक्त था। यही बालक आगे चलकर मकरध्वज कहलाया।
कुछ समय बाद पाताल लोक के सैनिकों ने उस मकरी को पकड़ लिया और उसे अहिरावण के पास ले गए। जब वहां से मकरध्वज का जन्म हुआ तो उसकी असाधारण शक्ति देखकर अहिरावण समझ गया कि यह कोई साधारण बालक नहीं है। उसने मकरध्वज को अपने संरक्षण में रखा और उसे पाताल लोक के मुख्य द्वार की रक्षा का दायित्व सौंप दिया। समय बीतता गया और मकरध्वज एक महान योद्धा बन गया। उसे अपने जन्म की पूरी सच्चाई का ज्ञान नहीं था। वह बस इतना जानता था कि उसका जीवन पाताल की रक्षा और अपने स्वामी के आदेश का पालन करने के लिए है।
जब यह रहस्य हनुमान जी के सामने आया तो वे स्वयं भी कुछ क्षण के लिए स्तब्ध रह गए। उन्हें बताया गया कि मकरध्वज उन्हीं का पुत्र है। हनुमान जी आजन्म ब्रह्मचर्य और भगवान श्रीराम की सेवा के लिए प्रसिद्ध थे, इसलिए यह बात उनके लिए भी अत्यंत अद्भुत थी। लेकिन मकरध्वज ने सिर झुकाकर कहा कि पिताजी, आप मेरे जन्मदाता हैं तो मेरे लिए पूजनीय हैं, लेकिन इस समय मैं पाताल लोक का द्वारपाल हूं। मेरे स्वामी ने मुझे जो जिम्मेदारी दी है, उसे मैं छोड़ नहीं सकता। यदि आवश्यकता पड़ी तो मैं अपने पिता के सामने भी अपने कर्तव्य के लिए खड़ा रहूंगा।
मकरध्वज की यह बात सुनकर हनुमान जी के हृदय में उसके लिए गर्व उत्पन्न हुआ। उन्होंने समझ लिया कि यह योद्धा केवल शक्तिशाली ही नहीं बल्कि अपने कर्तव्य के प्रति भी पूरी तरह समर्पित है। हनुमान जी ने उसे आशीर्वाद दिया और कहा कि तुमने आज अपने पिता को पराजित नहीं किया, बल्कि अपने धर्म और कर्तव्य की रक्षा की है। इसके बाद हनुमान जी ने मकरध्वज को सुरक्षित स्थान पर बांध दिया और अहिरावण के महल की ओर बढ़ गए।
अहिरावण ने श्रीराम और लक्ष्मण को देवी की पूजा के लिए बलि देने की तैयारी कर रखी थी। लेकिन उसे क्या पता था कि पवनपुत्र हनुमान उसके पूरे षड्यंत्र को समाप्त करने के लिए पाताल पहुंच चुके हैं। हनुमान जी ने अपनी बुद्धि और शक्ति से अहिरावण की मायावी शक्तियों का सामना किया। कथा के अनुसार, अहिरावण को पराजित करने के लिए हनुमान जी ने पंचमुखी रूप धारण किया और पांचों दिशाओं में जल रहे दिव्य दीपों को एक साथ बुझाया। इसके बाद उन्होंने अहिरावण का अंत कर दिया और श्रीराम तथा लक्ष्मण को उसके बंधन से मुक्त करा लिया।
श्रीराम और लक्ष्मण के मुक्त होने के बाद हनुमान जी उन्हें लेकर पाताल लोक से बाहर निकलने लगे। तभी उनकी नजर फिर मकरध्वज पर पड़ी। श्रीराम ने पूरी घटना सुनी तो वे मकरध्वज के कर्तव्य और निष्ठा से अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने कहा कि जिसने अपने स्वामी के आदेश के लिए अपने पिता के सामने भी कर्तव्य निभाया, वह वास्तव में महान है। श्रीराम ने मकरध्वज को पाताल लोक का राजा बनने का आशीर्वाद दिया। हनुमान जी ने अपने पुत्र को प्रेम से देखा और उसे धर्म, सत्य और कर्तव्य के मार्ग पर चलने का आशीर्वाद दिया।
इस कथा का सबसे सुंदर संदेश यही है कि मकरध्वज ने अपने पिता को पहचानने के बाद भी अपने कर्तव्य को नहीं छोड़ा और हनुमान जी ने भी पुत्र के इस धर्मपालन पर क्रोधित होने के बजाय उस पर गर्व किया। यही सच्चे धर्म की पहचान है। जीवन में रिश्ते महत्वपूर्ण हैं, लेकिन जब जिम्मेदारी सामने हो तो उसे ईमानदारी से निभाना भी उतना ही आवश्यक है। हनुमान जी की शक्ति, मकरध्वज की निष्ठा और श्रीराम की न्यायप्रियता इस कथा को और भी अद्भुत बना देती है। भक्तों के लिए यह कथा केवल पिता-पुत्र के मिलन की कहानी नहीं बल्कि धर्म, कर्तव्य, भक्ति और त्याग की प्रेरणा भी है। जय बजरंगबली। जय श्रीराम।
19/08/2026
सावन का पवित्र महीना था। चारों तरफ भक्ति का वातावरण बना हुआ था। गांवों से लेकर शहरों तक हर गली में “बोल बम” और “हर हर महादेव” के जयकारे गूंज रहे थे। दूर-दूर तक केसरिया वस्त्र पहने कांवड़िए दिखाई देते थे। किसी के कंधे पर साधारण सी कांवड़ थी तो किसी ने उसे फूलों, घंटियों और रंग-बिरंगी पताकाओं से सजा रखा था। किसी के पैरों में छाले पड़ चुके थे, किसी का गला लगातार जयकारे लगाने से बैठ चुका था, फिर भी किसी के कदम रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। सबके मन में बस एक ही संकल्प था कि किसी भी तरह पवित्र जल भोलेनाथ तक पहुंचाना है। लेकिन उसी सावन में पूरी धाम में ऐसी अद्भुत लीला होने वाली थी, जिसे देखकर हजारों भक्तों को अपनी आंखों पर विश्वास नहीं होने वाला था। क्योंकि कुछ ही दिनों बाद स्वयं भगवान जगन्नाथ अपने कंधे पर कांवड़ उठाकर एक भक्त की ओर चल पड़ने वाले थे। सवाल यह था कि आखिर क्यों? क्या भगवान शिव ने उन्हें बुलाया था? क्या कोई बड़ा संकट आने वाला था? या फिर किसी ऐसे भक्त की पुकार भगवान तक पहुंच चुकी थी, जिसकी आवाज दुनिया तक नहीं पहुंच पाई थी? इस रहस्य का उत्तर समय के साथ सामने आने वाला था।
कहानी शुरू होती है पूरी धाम से बहुत दूर बसे एक छोटे से गांव से। गांव छोटा था, लेकिन वहां के लोगों के दिल बहुत बड़े थे। चारों तरफ मिट्टी के घर, खेतों के बीच से गुजरती पतली पगडंडियां और सुबह-सुबह मंदिर की घंटियों की मधुर आवाज सुनाई देती थी। सावन आते ही पूरा गांव जैसे भक्ति के रंग में रंग जाता था। बच्चे हाथों में भगवा झंडियां लेकर गलियों में दौड़ते, मंदिरों में भजन और कीर्तन होते और गांव के नौजवान कांवड़ यात्रा की तैयारियों में जुट जाते। उन्हीं नौजवानों में एक था भोला। उसका नाम भी भोला था और स्वभाव भी बिल्कुल भोला। सीधा-सादा, मेहनती और कम बोलने वाला। लेकिन भगवान शिव के प्रति उसकी श्रद्धा ऐसी थी कि गांव का हर व्यक्ति उसे भोलेनाथ का सच्चा भक्त मानता था। हर वर्ष सावन में भोला कांवड़ लेकर यात्रा पर निकलता था। उसकी कांवड़ बहुत साधारण थी। एक पुराना बांस, दोनों ओर छोटे-छोटे कलश और ऊपर लाल कपड़े की एक पट्टी। लेकिन भोला के लिए वह केवल बांस और कलश नहीं थे। वह उसके पिता की आखिरी निशानी थी। उसके पिता जब जीवित थे तो हमेशा कहा करते थे, “बेटा, कांवड़ कितनी भी साधारण क्यों न हो, अगर उसे उठाने वाला दिल से भोलेनाथ को याद करता है तो वह सीधे भगवान तक पहुंचती है।” पिता अब इस संसार में नहीं थे, लेकिन उनकी आवाज आज भी भोला के मन में गूंजती थी। हर साल कांवड़ उठाने से पहले वह उसे माथे से लगाता और धीरे से कहता, “बाबा, इस बार भी आपके साथ चल रहा हूं।”
उस साल भी सावन आते ही भोला ने अपनी पुरानी कांवड़ निकालकर साफ की। उसने दोनों कलशों को धोया, बांस पर नया लाल कपड़ा बांधा और सुबह मंदिर जाकर भगवान शिव की पूजा की। बाहर से सब कुछ पहले जैसा ही था, लेकिन भोला के घर में एक बड़ी चिंता थी। उसकी मां कई दिनों से बीमार चल रही थीं और उस सुबह उनकी तबीयत पहले से भी ज्यादा खराब थी। भोला ने मां के माथे पर हाथ रखा और पूछा, “मां, अभी भी बुखार है?” मां ने आंखें खोलकर मुस्कुराने की कोशिश की और बोलीं, “कुछ नहीं हुआ बेटा, तू चिंता मत कर।” भोला थोड़ा नाराज होते हुए बोला, “आप हर बार यही कहती हो। सच क्यों नहीं बतातीं?” मां कुछ पल चुप रहीं और फिर धीरे से बोलीं, “सच यह है कि तू कांवड़ लेकर जाने की तैयारी कर रहा है और मुझे खुशी है कि मेरा बेटा हर साल की तरह इस बार भी भोलेनाथ की यात्रा पर जाएगा।” भोला ने मां की ओर देखा लेकिन उसके चेहरे पर चिंता साफ दिखाई दे रही थी। मां ने फिर पूछा, “तू जाएगा ना बेटा?” भोला चुप रहा। मां ने उसका हाथ पकड़कर कहा, “इस बार भी भोलेनाथ को जल चढ़ाएगा ना?” भोला ने नजरें झुका लीं। उसके मन में एक तरफ वर्षों पुराना संकल्प था और दूसरी तरफ उसकी बीमार मां। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या करे।
उसी शाम गांव के कुछ लड़के भोला के घर पहुंचे। उनमें से एक ने आवाज लगाई, “भोला, चल रहा है ना इस बार? पिछली बार तो तू सबसे आगे था।” दूसरा हंसते हुए बोला, “इस बार हमें पीछे मत छोड़ देना।” भोला ने मुस्कुराने की कोशिश करते हुए कहा, “तुम लोग जाओ, मैं देखता हूं।” उसके दोस्तों ने हंसकर कहा, “अरे ये देखता हूं क्या होता है? कांवड़ यात्रा है, कोई शादी नहीं कि इतना सोच-विचार करेगा।” वे हंसते हुए वहां से चले गए, लेकिन उनके जाते ही भोला की मुस्कान गायब हो गई। वह घर के अंदर आया तो मां उसे देख रही थीं। मां ने कहा, “बेटा, तू जा।” भोला ने तुरंत सिर हिला दिया, “नहीं मां, मैं आपको छोड़कर नहीं जाऊंगा।” मां ने समझाया, “पड़ोस वाली काकी हैं ना, वे मेरा ध्यान रख लेंगी।” भोला ने कहा, “नहीं मां, भगवान की यात्रा बार-बार आ जाएगी, लेकिन आपकी सेवा करने का मौका अगर आज चला गया तो शायद दोबारा न मिले।” मां कुछ नहीं बोलीं। उन्होंने बस अपने बेटे के सिर पर हाथ रख दिया। उस स्पर्श में आशीर्वाद भी था और बेटे की भक्ति को समझ लेने का भाव भी।
अगली सुबह गांव में कांवड़ यात्रा शुरू हो गई। ढोल बजने लगे, शंख बजने लगे और चारों तरफ “बोल बम” के जयकारे गूंज उठे। एक-एक करके गांव के सभी कांवड़िए निकलने लगे। भोला अपने घर के दरवाजे पर खड़ा सबको जाते हुए देखता रहा। किसी ने पीछे मुड़कर आवाज लगाई, “भोला, जल्दी आ जाना।” भोला ने केवल हाथ हिला दिया। कुछ देर बाद सड़क खाली हो गई। जयकारों की आवाज धीरे-धीरे दूर होती चली गई और पूरा गांव शांत हो गया। भोला धीरे-धीरे घर के अंदर आया। उसकी नजर दीवार से टिकी अपनी कांवड़ पर पड़ी। वह कुछ देर तक उसे देखता रहा। फिर उसने कांवड़ उठाई, उसे अपने सीने से लगाया और उसकी आंखों से एक आंसू निकलकर कांवड़ पर गिर पड़ा। उसने आंखें बंद करके कहा, “भोलेनाथ, इस बार मैं आपके पास नहीं आ पाया। मां को छोड़ नहीं सकता। अगर मेरी भक्ति में सच्चाई है तो मेरी मजबूरी समझ लेना।” उसने कांवड़ वापस रख दी और भगवान शिव की तस्वीर के सामने बैठकर हाथ जोड़ लिए। उसने न कोई शिकायत की, न कोई सवाल किया। बस सिर झुका दिया। लेकिन भोला को क्या पता था कि उसकी यह छोटी सी प्रार्थना उस स्थान तक पहुंच चुकी थी, जहां से भगवान अपने भक्तों के दिल की आवाज सुनते हैं।
उसी समय बहुत दूर पूरी धाम में भगवान जगन्नाथ के मंदिर के भीतर अचानक एक गहरी शांति छा गई। दीपक की लौ हल्के से कांपी। एक सेवक ने दूसरे की ओर देखा और पूछा, “तुमने कुछ महसूस किया?” दूसरे सेवक ने कहा, “पता नहीं, लेकिन आज कुछ अलग लग रहा है।” तभी भगवान जगन्नाथ के श्रीमुख पर एक हल्की मुस्कान दिखाई दी। वह मुस्कान ऐसी थी जैसे उन्हें किसी के दर्द का पता चल गया हो। कुछ ही क्षण बाद मंदिर की घंटियां तेज हो उठीं। महाप्रभु की दृष्टि जैसे किसी अनजानी दिशा में टिक गई। वहां कौन था, क्या हुआ था और भगवान किसकी ओर देख रहे थे, यह किसी को पता नहीं था। लेकिन एक बात निश्चित थी कि महाप्रभु ने अपने मन में कोई निर्णय ले लिया था।
इधर भोला की जिंदगी पहले जैसी चलती रही। गांव के बाकी लोग कांवड़ यात्रा पर जा चुके थे। भोला सुबह उठता, सबसे पहले मां के लिए दवा तैयार करता, फिर खेतों में मजदूरी करने चला जाता। शाम को लौटकर खाना बनाता, मां को खिलाता और रात में भगवान शिव के सामने दीपक जलाकर कुछ देर शांत बैठता। लेकिन उसके मन में एक सवाल बार-बार उठता, “क्या मैंने अपना संकल्प तोड़ दिया?” एक दिन गांव का ही एक व्यक्ति उसे रास्ते में मिल गया। उसने पूछा, “अरे भोला, इस बार कांवड़ नहीं उठाई?” भोला ने धीरे से कहा, “मां की तबीयत ठीक नहीं है।” वह व्यक्ति हंसते हुए बोला, “भक्ति में इतनी भी मजबूरी कैसी? भगवान के लिए थोड़ा त्याग तो करना ही पड़ता है।” भोला ने कोई जवाब नहीं दिया। वह चुपचाप आगे बढ़ गया। घर पहुंचकर वह सीधा अपनी कांवड़ के पास गया और उसे देखते हुए बोला, “भोलेनाथ, लोग कुछ भी कहें, आप तो जानते हैं ना कि मैं क्यों नहीं आया।” उसे नहीं पता था कि उसका यह सवाल भी सुना जा चुका है।
उधर पूरी धाम में भी कुछ बदल रहा था। मंदिर के सेवक पूजा की तैयारियों में लगे थे। एक सेवक ने दूसरे से कहा, “आज महाप्रभु का ध्यान कहीं और लगा हुआ लगता है।” दूसरे ने कहा, “कहीं कोई भक्त उन्हें याद तो नहीं कर रहा?” उसी समय भगवान जगन्नाथ के सामने रखा एक फूल नीचे गिर पड़ा। सेवक ने फूल उठाया और भगवान के श्रीमुख की ओर देखा। वही रहस्यमयी मुस्कान उनके चेहरे पर थी। जैसे कोई फैसला हो चुका हो। उधर कैलाश पर भगवान शिव शांत भाव से बैठे थे। माता पार्वती ने पूछा, “स्वामी, आज आपके मन में कुछ चल रहा है?” महादेव मुस्कुराए और बोले, “एक भक्त अपने धर्म को लेकर परेशान है।” माता पार्वती ने पूछा, “कौन सा भक्त?” भगवान शिव ने अपनी आंखें बंद कर लीं और बोले, “वही जिसे लगता है कि उसने मुझे छोड़ दिया है, जबकि असल में उसने मुझे ही चुना है।” पार्वती जी कुछ समझ नहीं पाईं। उन्होंने पूछा, “मैं समझी नहीं।” महादेव मुस्कुराकर बोले, “समय आने दो देवी।”
कुछ दिन और बीत गए। एक रात भोला की मां की तबीयत अचानक बहुत बिगड़ गई। भोला घबरा गया। उसने मां को पुकारा, “मां, आंखें खोलो।” मां ने मुश्किल से आंखें खोलीं और बोलीं, “डर मत बेटा, मैं ठीक हूं।” भोला की आंखों से आंसू निकल पड़े। उसने कहा, “मां, आप बस ठीक हो जाओ। मुझे और कुछ नहीं चाहिए।” उस रात वह भगवान शिव के सामने बैठा। दीपक की लौ उसके चेहरे पर कांप रही थी। उसने हाथ जोड़कर कहा, “प्रभु, मैंने कभी आपसे कुछ नहीं मांगा। आज बस मां को ठीक कर दीजिए। मैं कांवड़ नहीं ला पाया, इसका दुख है, लेकिन मां को छोड़कर आता तो शायद खुद को कभी माफ नहीं कर पाता।” उसकी आवाज भर्रा गई। तभी घर के बाहर किसी ने आवाज लगाई, “भोला!” भोला तुरंत उठकर बाहर आया, लेकिन वहां कोई नहीं था। सिर्फ ठंडी हवा चल रही थी। आसमान में बादलों के बीच एक अजीब सी चमक दिखाई दे रही थी। भोला कुछ देर तक उस चमक को देखता रहा और फिर वापस घर के अंदर चला गया।
उधर उसी समय पूरी धाम में मंदिर की घंटियां अचानक तेज हो उठीं। लोग घबराकर मंदिर की ओर दौड़ने लगे। किसी को समझ नहीं आ रहा था कि आखिर क्या हो रहा है। लेकिन महाप्रभु अपना निर्णय ले चुके थे। अगले दिन सुबह पूरी धाम में भक्तों की भीड़ हमेशा की तरह दर्शन के लिए कतार में खड़ी थी। मंदिर में पूजा चल रही थी। तभी भगवान जगन्नाथ के सामने जल रहा दीपक तेजी से कांपने लगा। एक सेवक ने दूसरे की ओर देखा। अचानक मंदिर के भीतर एक दिव्य सुगंध फैल गई। भगवान जगन्नाथ के श्रीमुख पर वही करुणामयी मुस्कान दिखाई दी। कुछ ही क्षण बाद मंदिर के विशाल द्वार धीरे-धीरे खुलने लगे। बाहर खड़ी भीड़ की नजरें एक साथ द्वार की ओर उठ गईं। तभी किसी ने जोर से पुकारा, “महाप्रभु बाहर आ रहे हैं!” भीड़ में हलचल मच गई। लेकिन अगले ही पल जो दृश्य सामने आया, उसे देखकर हजारों भक्तों की सांसें थम गईं। स्वयं भगवान जगन्नाथ के कंधे पर एक कांवड़ थी। एक बुजुर्ग भक्त की आंखों में आंसू आ गए। वह कांपती आवाज में बोला, “महाप्रभु कांवड़ लेकर कहां जा रहे हैं?” किसी के पास इसका उत्तर नहीं था। जगन्नाथ जी शांत भाव से आगे बढ़ते रहे और धीरे-धीरे भक्तों की भीड़ भी उनके पीछे चल पड़ी।
किसी ने कहा, “शायद भगवान शिव ने उन्हें बुलाया है।” दूसरा बोला, “नहीं, जरूर किसी भक्त की पुकार है।” हजारों श्रद्धालु महाप्रभु के पीछे चलने लगे। उधर कैलाश पर भगवान शिव ने आंखें खोलीं। माता पार्वती ने पूछा, “स्वामी, क्या होने वाला है?” महादेव के चेहरे पर मुस्कान थी। उन्होंने कहा, “आज एक भक्त को पता चलेगा कि उसकी भक्ति अधूरी नहीं थी।” पार्वती जी ने पूछा, “कौन सा भक्त?” शिवजी ने दूर आकाश की ओर देखते हुए कहा, “वही जिसने मेरे पास आने के बजाय अपनी मां के पास रहना चुना।” उधर भोला अपनी मां के पास बैठा था। अचानक गांव के बाहर शोर सुनाई दिया। लोग चिल्ला रहे थे, “भगवान जगन्नाथ आ गए!” भोला चौंककर बाहर निकला। पहले तो उसे विश्वास ही नहीं हुआ। दूर सड़क पर हजारों लोगों की भीड़ थी और उस भीड़ के बीच स्वयं भगवान जगन्नाथ उसकी ओर बढ़ रहे थे। भोला की आंखों से आंसू बहने लगे। उसने हाथ जोड़ दिए और जमीन पर बैठ गया।
भगवान जगन्नाथ उसके सामने आकर रुक गए। फिर उन्होंने धीरे-धीरे अपने कंधे से कांवड़ उतारी। भोला फूट-फूटकर रो पड़ा। उसने कहा, “प्रभु, मैं आपके पास नहीं आ सका। मां को छोड़ नहीं पाया। इसलिए मेरा संकल्प अधूरा रह गया।” भगवान जगन्नाथ के श्रीमुख पर करुणा भरी मुस्कान थी। उन्होंने कहा, “तुम्हारा संकल्प अधूरा नहीं था भोला। तुमने अपनी मां की सेवा को चुना था।” भोला ने आंसुओं से भरी आंखों से प्रभु को देखा। महाप्रभु ने कांवड़ की ओर इशारा करते हुए कहा, “तुम मेरे लिए नहीं आ सके, इसलिए मैं तुम्हारे लिए चला आया।” भोला की आंखों से आंसुओं की धारा बहने लगी। गांव के लोग भी भावुक हो गए। लेकिन भोला के मन में अभी भी एक सवाल था। उसने कांपती आवाज में पूछा, “प्रभु, यह कांवड़ लेकर आप आखिर जा कहां रहे थे?” भगवान जगन्नाथ मुस्कुराए और बोले, “जहां तुम जाना चाहते थे। तुम्हारा संकल्प था कि भोलेनाथ तक जल पहुंचाना है। तुम नहीं जा सके, इसलिए आज तुम्हारी जगह मैं जाऊंगा।”
भोला की मां ने कमजोर आवाज में कहा, “प्रभु, मेरे बेटे ने तो आपकी यात्रा छोड़ दी थी। क्या आपने इसे क्षमा कर दिया?” महाप्रभु ने कहा, “मां, जिसने अपने सुख से पहले आपकी सेवा को चुना हो, उसे क्षमा की जरूरत नहीं। उसकी सेवा ही उसकी पूजा है।” भोला ने मां की ओर देखा। मां मुस्कुराईं और बोलीं, “जा बेटा, आज तेरी कांवड़ खुद भगवान उठा रहे हैं।” भोला ने मां के चरण छुए और भगवान जगन्नाथ के पीछे चल पड़ा। हजारों भक्त भी उनके साथ हो लिए। चलते-चलते मौसम बदलने लगा। आसमान में काले बादल छा गए और हल्की बारिश शुरू हो गई। कुछ दूर जाने के बाद भोला ने सामने देखा तो दूर बर्फ से ढकी ऊंची चोटियां दिखाई देने लगीं। भोला ठिठक गया। उसने पूछा, “प्रभु, क्या हम...” भगवान जगन्नाथ मुस्कुराए, “हां भोला, अब हम कैलाश जा रहे हैं।”
उधर कैलाश पर भगवान शिव जैसे पहले से ही उनका इंतजार कर रहे थे। माता पार्वती ने दूर आकाश की ओर देखा और पूछा, “स्वामी, वो आ गए?” महादेव मुस्कुराए और बोले, “हां देवी। लेकिन इस बार कांवड़ कोई भक्त नहीं, मेरा प्रिय जगन्नाथ लेकर आ रहा है।” कैलाश की चोटियों पर अचानक दिव्य प्रकाश फैल गया। भोला को अब भी पता नहीं था कि अगले कुछ क्षणों में वह ऐसी लीला देखने वाला है जिसे वह जीवन भर नहीं भूल पाएगा। सामने बर्फ से ढका कैलाश था। ठंडी हवा चल रही थी और उस दिव्य वातावरण में स्वयं भगवान शिव खड़े थे। ऐसा लग रहा था जैसे उन्हें पहले से पता था कि महाप्रभु आने वाले हैं। भगवान जगन्नाथ आगे बढ़े। उनके कंधे पर वही कांवड़ थी। महादेव ने मुस्कुराकर कहा, “आइए महाप्रभु।” भगवान जगन्नाथ भी मुस्कुराए। उन्होंने कांवड़ नीचे रखी और दोनों कलशों का जल लेकर भगवान शिव को अर्पित किया।
भोला यह दृश्य देखकर भावुक हो गया। जिस जल को वह स्वयं लेकर आने वाला था, आज वही जल भगवान जगन्नाथ अपने हाथों से महादेव को चढ़ा रहे थे। भोला रोते हुए बोला, “प्रभु, मेरी इतनी सी भक्ति के लिए आपने इतना कष्ट क्यों किया?” भगवान शिव उसके पास आए और बोले, “कष्ट? भक्त के लिए चलना भगवान के लिए कष्ट नहीं, सौभाग्य है।” भोला की आंखों से आंसू बहते रहे। महादेव ने कहा, “तुम्हें लगता था कि इस बार तुम अपनी कांवड़ यात्रा पूरी नहीं कर पाए। लेकिन तुमने जो किया, वह उससे भी बड़ी यात्रा थी। तुमने अपनी इच्छा से पहले अपनी मां को चुना। याद रखना, जहां निस्वार्थ प्रेम होता है, वहीं भगवान की पूजा पूरी हो जाती है।” भगवान जगन्नाथ ने मुस्कुराकर कहा, “भक्त भगवान तक पहुंचने के लिए हजारों कदम चलता है, लेकिन जब किसी मजबूरी में उसके कदम रुक जाते हैं, तब भगवान खुद उसके लिए पूरी यात्रा चल पड़ते हैं।”
भोला फूट-फूटकर रो पड़ा। माता पार्वती ने उसकी मां को आशीर्वाद दिया और धीरे-धीरे उसकी मां की तबीयत भी ठीक होने लगी। भोला के लिए उस दिन सबसे बड़ा चमत्कार यही था कि उसे समझ आ गया था कि भगवान को पाने के लिए केवल लंबी यात्राएं करना ही भक्ति नहीं है। किसी भूखे को भोजन कराना, किसी बीमार की सेवा करना, मां-बाप का हाथ पकड़ना, किसी जरूरतमंद की मदद करना और अपनी खुशी से पहले किसी दूसरे की जरूरत को समझना भी पूजा ही है। उस दिन कैलाश की पवित्र चोटियों पर दो जयकारे एक साथ गूंज उठे, “हर हर महादेव” और “जय जगन्नाथ।” भोला ने हाथ जोड़कर कहा, “प्रभु, अब समझ आया। मैं आपको ढूंढने निकला था, लेकिन आप तो पहले से मेरे साथ थे।” महादेव मुस्कुराए और भगवान जगन्नाथ ने कहा, “याद रखना भोला, सच्ची भक्ति में भगवान और भक्त के बीच दूरी नहीं होती। भक्त एक कदम पीछे हटे तो भगवान खुद आगे बढ़कर उसके पास आ जाते हैं।”
उस दिन भगवान जगन्नाथ कांवड़ इसलिए नहीं उठा रहे थे कि दुनिया को अपना चमत्कार दिखा सकें। वह कांवड़ इसलिए उठा रहे थे क्योंकि उनका भक्त अपने भगवान तक पहुंचने में असमर्थ था। और भगवान अपने सच्चे भक्त को अकेला कैसे छोड़ सकते थे? भोला ने उस दिन जाना कि भक्ति केवल मंदिर तक पहुंचने का नाम नहीं, बल्कि उस प्रेम का नाम है जिसमें इंसान अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर किसी दूसरे के लिए खड़ा होता है। भगवान के लिए चढ़ाया गया जल पवित्र होता है, लेकिन किसी की सेवा में बहा प्रेम भी उतना ही पवित्र होता है। और जब भक्ति के पीछे सच्चा भाव हो, तो भगवान को बुलाने के लिए ऊंची आवाज में पुकारने की भी जरूरत नहीं पड़ती। एक सच्चे भक्त की आंख से निकला एक आंसू भी भगवान तक पहुंच जाता है। भोला की कांवड़ उसके घर में रह गई थी, लेकिन उसकी भक्ति भगवान तक पहुंच गई थी। इसलिए जब भक्त भगवान तक नहीं पहुंच पाया, तो भगवान खुद भक्त तक चले आए। यही सच्ची भक्ति की शक्ति है। हर हर महादेव। जय जगन्नाथ।
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