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This Page is all about Wellness,Nutrition, Health,Exercise,Ayurveda etc.

Photos from JoGee Wellness World's post 01/06/2024

आहार के नियम भारतीय 12 महीनों अनुसार
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#चैत्र ( मार्च-अप्रैल) – इस महीने में गुड का सेवन करे क्योकि गुड आपके रक्त संचार और रक्त को शुद्ध करता है एवं कई बीमारियों से भी बचाता है। चैत्र के महीने में नित्य नीम की 4 – 5 कोमल पतियों का उपयोग भी करना चाहिए इससे आप इस महीने के सभी दोषों से बच सकते है। नीम की पतियों को चबाने से शरीर में स्थित दोष शरीर से हटते है।

#वैशाख (अप्रैल – मई)- वैशाख महीने में गर्मी की शुरुआत हो जाती है। बेल पत्र का इस्तेमाल इस महीने में अवश्य करना चाहिए जो आपको स्वस्थ रखेगा। वैशाख के महीने में तेल का उपयोग बिल्कुल न करे क्योकि इससे आपका शरीर अस्वस्थ हो सकता है।

#ज्येष्ठ (मई-जून) – भारत में इस महीने में सबसे अधिक गर्मी होती है। ज्येष्ठ के महीने में दोपहर में सोना स्वास्थ्य वर्द्धक होता है , ठंडी छाछ , लस्सी, ज्यूस और अधिक से अधिक पानी का सेवन करें। बासी खाना, गरिष्ठ भोजन एवं गर्म चीजो का सेवन न करे। इनके प्रयोग से आपका शरीर रोग ग्रस्त हो सकता है।

#अषाढ़ (जून-जुलाई) – आषाढ़ के महीने में आम , पुराने गेंहू, सत्तु , जौ, भात, खीर, ठन्डे पदार्थ , ककड़ी, पलवल, करेला, बथुआ आदि का उपयोग करे व आषाढ़ के महीने में भी गर्म प्रकृति की चीजों का प्रयोग करना आपके स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकता है।

#श्रावण (जूलाई-अगस्त) – श्रावण के महीने में हरड का इस्तेमाल करना चाहिए। श्रावण में हरी सब्जियों का त्याग करे एव दूध का इस्तेमाल भी कम करे। भोजन की मात्रा भी कम ले – पुराने चावल, पुराने गेंहू, खिचड़ी, दही एवं हलके सुपाच्य भोजन को अपनाएं।

#भाद्रपद (अगस्त-सितम्बर) – इस महीने में हलके सुपाच्य भोजन का इस्तेमाल कर वर्षा का मौसम् होने के कारण आपकी जठराग्नि भी मंद होती है इसलिए भोजन सुपाच्य ग्रहण करे। इस महीने में चिता औषधि का सेवन करना चाहिए।

#आश्विन (सितम्बर-अक्टूबर) – इस महीने में दूध , घी, गुड़ , नारियल, मुन्नका, गोभी आदि का सेवन कर सकते है। ये गरिष्ठ भोजन है लेकिन फिर भी इस महीने में पच जाते है क्योकि इस महीने में हमारी जठराग्नि तेज होती है।

#कार्तिक (अक्टूबर-नवम्बर) – कार्तिक महीने में गरम दूध, गुड, घी, शक्कर, मुली आदि का उपयोग करे। ठंडे पेय पदार्थो का प्रयोग छोड़ दे। छाछ, लस्सी, ठंडा दही, ठंडा फ्रूट ज्यूस आदि का सेवन न करे , इनसे आपके स्वास्थ्य को हानि हो सकती है।

#अगहन (नवम्बर-दिसम्बर) – इस महीने में ठंडी और अधिक गरम वस्तुओ का प्रयोग न करे।

#पौष (दिसम्बर-जनवरी) – इस ऋतू में दूध, खोया एवं खोये से बने पदार्थ, गौंद के लाडू, गुड़, तिल, घी, आलू, आंवला आदि का प्रयोग करे, ये पदार्थ आपके शरीर को स्वास्थ्य देंगे। ठन्डे पदार्थ, पुराना अन्न, मोठ, कटु और रुक्ष भोजन का उपयोग न करे।

#माघ (जनवरी-फ़रवरी) – इस महीने में भी आप गरम और गरिष्ठ भोजन का इस्तेमाल कर सकते है। घी, नए अन्न, गौंद के लड्डू आदि का प्रयोग कर सकते है।

#फाल्गुन (फरवरी-मार्च) – इस महीने में गुड का उपयोग करे। सुबह के समय योग एवं स्नान का नियम बना ले। चने का उपयोग न करे।

01/06/2024

हमारे बुजर्ग हम से वैज्ञानिक रूप से बहुत आगे थे थक हार कर वापिश उनकी ही राह पर वापिश आना पड़ रहा है।

1. मिट्टी के बर्तनों से स्टील और प्लास्टिक के बर्तनों तक और फिर कैंसर के खौफ से दोबारा मिट्टी के बर्तनों तक आ जाना।

2. अंगूठाछाप से दस्तखतों (Signatures) पर और फिर अंगूठाछाप (Thumb Scanning) पर आ जाना।

3. फटे हुए सादा कपड़ों से साफ सुथरे और प्रेस किए कपड़ों पर और फिर फैशन के नाम पर अपनी पैंटें फाड़ लेना।

4. सूती से टैरीलीन, टैरीकॉट और फिर वापस सूती पर आ जाना ।

5. जयादा मशक़्क़त वाली ज़िंदगी से घबरा कर पढ़ना लिखना और फिर IIM MBA करके आर्गेनिक खेती पर पसीने बहाना।

6. क़ुदरती से प्रोसेसफ़ूड (Canned Food & packed juices) पर और फिर बीमारियों से बचने के लिए दोबारा क़ुदरती खानों पर आ जाना।

7. पुरानी और सादा चीज़ें इस्तेमाल ना करके ब्रांडेड (Branded) पर और फिर आखिरकार जी भर जाने पर पुरानी (Antiques) पर उतरना।

8. बच्चों को इंफेक्शन से डराकर मिट्टी में खेलने से रोकना और फिर घर में बंद करके फिसड्डी बनाना और होश आने पर दोबारा Immunity बढ़ाने के नाम पर मिट्टी से खिलाना....

9. गाँव, जंगल, से डिस्को पब और चकाचौंध की और भागती हुई दुनियाँ की और से फिर मन की शाँति एवं स्वास्थ के लिये शहर से जँगल गाँव की ओर आना।

इससे ये निष्कर्ष निकलता है कि टेक्नॉलॉजी ने जो दिया उससे बेहतर तो प्रकृति ने पहले से दे रखा था।
#सदा_स्वस्थ_रहें

01/06/2024

करेला के फायदे, नुकसान और उपयोग
करेला की सब्जी स्वास्थ्य के लिए बहुत ही फायदेमंद होती है। कड़वी होने के कारण, भले ही सभी लोग करेले की सब्जी नहीं खाते हों, लेकिन इसके बारे में जानते जरूर होंगे। आमतौर पर लोग केवल इतना ही जानते हैं कि करेला डायबिटीज (मधुमेह) में फायदा पहुंचाता है, लेकिन सच यह है कि आप करेला का प्रयोग कर कई रोगों को भी ठीक कर सकते हैं।

करेला में मौजूद पोषक तत्वों की जानकारी अधिकांश लोगों को है ही नहीं। इस कारण अनेक लोग इसका प्रयोग नहीं कर पाते। आयुर्वेद के अनुसार, करेला मधुमेह (डायबिटीज) के साथ-साथ कई और रोगों में भी लाभ पहुंचाता है। अगर आप कड़वेपन के कारण करेला का उपयोग नहीं करते हैं तो, मैं आपको यह विश्वास दिलाता हूं कि इस जानकारी के बाद आप भी करेला से फायदा लेने लगेंगे।

करेला क्या है?
करेला स्वाद में कड़वा, और थोड़ा-सा तीखा होता है। मधुमेह के रोगी विशेषतः करेला के रस, और सब्जी का सेवन करते हैं। करेला का सेवन अनेक बीमारियों जैसे- पाचनतंत्र की खराबी, भूख की कमी, पेट दर्द, बुखार, और आंखों के रोग में लाभ पहुंचाता है। योनि या गर्भाशय रोग, कुष्ठ रोगों, तथा अन्य बीमारियों में भी आप करेला से फायदा ले सकते हैं। करेले से कमजोरी दूर होती है, और जलन, कफ, सांसों से संबंधित विकार में लाभ मिलता है। चिड़चिड़ाहट, सुजाक, बवासीर आदि में भी करेले से फायदा मिलता है। करेला के बीज घाव, आहार नलिका, तिल्ली विकार, और लिवर से संबंधित समस्याओं में करेला लाभदायक होता है।

अन्य भाषाओं में करेला के नाम
करेला का वानस्पतिक नाम मोमोर्डिका चरांशिया (Momordica charantia L, Syn-Momordicachinensis Spreng, Momordica indica Linn) है, और यह कुकुरबिटेसी (Cucurbitaceae) कुल का हैं, इसे दुनिया भर में इन नामों से भी जाना जाता हैः-

Hindi- करेला, करैला, करइला, करेली
Urdu- करेला (Karela)
English (karela in English)- बिटर स्क्वैश (Bitter squash), बालसम पियर (Balsam pear), वाईल्ड कुकम्बर (Wild cucumber), बिटर गॉर्ड (Bitter gourd)
Sanskrit- कारवेल्ली, वारिवल्ली, बृहद्वल्ली, पीतफला, पीतपुष्पा, सूक्ष्मवल्ली, कण्टफला, अम्बुवल्लिका, कारवेल्लक, कटिल्लक
Oriya- करेना (Karena), कालरा (Kalara), सलारा (Salara)
Assamese- काकीरल (Kakiral), काकरल (Kakral)
Kannada- हगलाकायी (Haglakayi), करंट (Karant)
Gujarati- करेला (Karela), करेलु (Karelu)
Telugu- काकरा (Kakra), उरकाकरा (Urkakara), पाकल (Pakal)
Tamil- पावक्काचेडी (Pavakkachedi), पावक्कयी (Pavakkayi), पावल (Paval)
Bengali- करला (Karala), बड़मसिया (Baramasiya), उच्छे (Uchchhe), जेटुआ (Jethuya)
Punjabi- करेला (Karela), करीला (Karila)
Marathi- करेले (Karale), कारली (Karli)
Malayalam- कायप्पावल्ली (Kaippavalli), पावक्काचेटी (Pavakkacheti)।
Nepali- करेला (Karela)
Persian- करेलाह (Karelah), सिमहेंग (Simhang)
Arabic- क्यीसाउलबर्री (Qisaulbarri), उल्हीमर (Ulhimar), खयार करिल्ला (Khyar karilla)
करेला के फायदे
करेला पोषक तत्वों का भंडार है। इसका औषधीय प्रयोग, इस्तेमाल की मात्रा, या तरीका, तथा विधियां ये हैंः-

करेला के इस्तेमाल से डैंड्रफ (रूसी) की परेशानी खत्म
बहुत सारी महिलाएं, या पुरुष डैंड्रफ (रूसी) से परेशान रहते हैं। डैंड्रफ को हटाने के लिए बहुत उपाय भी करते हैं, लेकिन फिर भी रूसी की परेशानी खत्म नहीं होती। आप ये उपाय कर सकते हैं। करेले के पत्ते के रस को सिर में लगाने से रूसी की समस्या खत्म होती है।
करेला के पत्ते के रस में हल्दी मिलाकर प्रयोग करने से भी डैंड्रफ से छुटकारा मिलता है।

आवाज बैठने (गला बैठने) पर करेला का उपयोग
ज्यादा जोर से बोलने, या चिल्लाने से आपका गला बैठ गया है। आवाज सही से निकल पा रही है, तो 5 ग्राम करेला के जड़ के पेस्ट को मधु, या 5 मिली तुलसी के रस के साथ मिलाकर सेवन करें। इससे परेशानी ठीक होती है।

गले की सूजन में करेला का प्रयोग
गले की सूजन की परेशानी में सूखे करेला को सिरके में पीस लें। इसे गर्म करके लेप करें। इससे गले की सूजन ठीक हो जाती है।

सांसों के रोग, जुकाम, और कफ में करेला का सेवन
अगर आप 5 ग्राम करेले के जड़ का पेस्ट बना लें। इसमें मधु, या 5 मिली तुलसी के रस मिला लें। इसका सेवन करें। इससे सांसों के रोग, जुकाम, और कफ की बीमारी ठीक हो सकती है।

कान के दर्द में करेले से फायदा
कान के दर्द में भी करेला का इस्तेमाल लाभदायक होता है। करेले के ताजे फलों, या पत्तों को कूटकर रस निकाल लें। इसे गुनगुना करके 1-2 बूंद कान में डालने से कान का दर्द ठीक होता है।

सिर दर्द में करेले के प्रयोग से लाभ
सिर दर्द में भी करेला से फायदा होता है। करेला के पत्ते के रस में थोड़ा गाय का घी, और पित्तपापड़े का रस मिला लें। इसका लेप करने से सिर दर्द में आराम मिलता है।

बच्चों के आमाशय विकार में करेले का उपयोग
कई बार छोटे बच्चों को अमाशय संबंधी बीमारी हो जाती है। ऐसे में 6 मिली करेला के पत्ते के रस में थोड़ा-सा हल्दी का चूर्ण मिला लें। इसी पीने से बीमारी ठीक होती है।

पेट में कीड़े होने पर करेले का सेवन
पेट में कीड़े हैं, तो 10-12 मिली करेला के पत्ते का रस पिलाएं। इससे पेट के कीड़े मर जाते हैं।
इसी तरह 2-3 ग्राम करेला के बीजों को पीसकर सेवन करने से लाभ होता है।

हैजा में फायदेमंद करेला का प्रयोग
हैजा में भी करेले से फायदा होता है। 20-30 मिली करेला के जड़ का काढ़ा बना लें। इसे तिल के तेल में मिलाकर पीने से हैजा में लाभ होता है।
5 मिली करेला के पत्ते के रस में तेल मिलाकर सेवन करने से भी हैजा में लाभ होता है।

जलोदर रोग में लाभदायक करेला का उपयोग
जलोदर रोग पेट की बीमारी है, जिसमें पेट में पानी भर जाता है। इसमें रोगी का पेट फूल जाता है। इसमें 10-15 मिली करेला के पत्ते के रस में मधु मिलाकर पिलाने से लाभ होता है।

स्तनों में दूध को बढ़ाने के लिए करेला का सेवन
प्रायः अनेक महिलाएं यह शिकायत करती हैं, कि मां बनने के बाद शिशु के पीने लायक दूध नहीं हो रहा है। महिलाएं करेले के 20 ग्राम पत्तों को पानी में उबाल लें। इसे छानकर पिएं। इससे स्तनों में दूध की वृद्धि होती है।

मासिक धर्म विकार में करेला का प्रयोग
मासिक धर्म के विकार में भी करेला का उपयोग फायदेमंद हो सकता है। 10-15 मिली करेला के पत्ते के रस में 1 ग्राम सोंठ, 500 मिग्रा काली मिर्च, और 500 मिग्रा पीपल का चूर्ण मिला लें। इसे दिन में तीन बार पिलाने से मासिक धर्म विकारों में लाभ होता है।

करेला का प्रयोग कर दाद का इलाज
करेला का प्रयोग कर दाद को ठीक किया जा सकता है। करेले के पत्ते के रस को दाद वाले स्थान पर लगाने से दाद ठीक हो जाता है।

चर्म रोग में फायदेमंद करेला का इस्तेमाल
करेला के उपयोग से चर्म रोग में भी लाभ मिलता है। करेला के पौधे, दालचीनी, पीपर और चावल को जंगली बादाम के तेल में मिला लें। इसे लगाने से त्वचा विकार, या चर्म रोग में फायदा होता है।

वायरल फीवर में करेले का सेवन
आप करेले का फायदा वायरल फीवर, या ठंड लगकर आने वाले बुखार में भी ले सकते हैं। इसके लिए करेले के 10-15 मिली रस में जीरे का चूर्ण मिला लें। इसे दिन में तीन बार पिलाने से राहत मिलती है।

तलवों की जलन में करेला का इस्तेमाल
कई लोग तलवे में जलन की परेशानी से परेशान रहते हैं। इसमें करेला के पत्ते के रस को तलवे पर लगाएं। इससे आराम मिलता है।

मुंह के छाले में करेले के इस्तेमाल से लाभ
मुंह में छाले होने पर करेले के रस में सुहागा की खील मिला लें। इसे लगाने से लाभ होता है। इसमें पाए जाने वाले पोषक तत्व छालों को जल्दी ठीक करते हैं।

करेला का प्रयोग कर फुंसी का इलाज

चेहरे या शरीर के अन्य अंगों पर फुन्सी हो गई है तो करेला के पत्ते के रस को फुंसी पर लगाएं। इससे फुन्सी ठीक होती है।

निमोनिया में करेले का सेवन
करेला का प्रयोग निमोनिया में लाभदायक होता है। आप 5-10 मिली करेला के पत्ते के रस को गुनगुना कर लें। इसमें थोड़ी केसर मिला लें। इसे दिन में तीन बार पिलाने से निमोनिया में लाभ होता है।

आंखों के रोग में करेला का इस्तेमाल

आंखों से संबंधित कई विकारों में करेला का उपयोग बेहतर परिणाम देता है। आंखों के रोग से पीड़ित लोग, लोहे के बर्तन में करेले के पत्तों का रस निकाल लें। इसमें एक काली मिर्च घिस लें। इसका काजल की तरह लगाने से आंखों के दर्द, आंखों की जलन, और रतौंधी में फायदा होता है।

मोतियाबिंद में करेला का इस्तेमाल
करेले से मोतियाबिंद में फायदा पहुंचाता है। मोतियाबिंद से ग्रस्त लोग, करेले की जड़ को घोड़े के पेशाब (अश्व मूत्र) में घिस लें। इसे 1-2 बूंद की मात्रा में आंखों में डालने से मोतियाबिंद में लाभ होता है।

रतौंधी में लाभदायक करेला का प्रयोग
कुछ लोगों को रात में अंधेपन की समस्या होती है। इस बीमारी में लोगों को दिन की तुलना में रात के समय ठीक से दिखाई नहीं देता है। इसमें करेला के पत्ते के पेस्ट बना लें। इसे आंखों के चारों तरफ लेप करने से रात के अंधेपन की समस्या में लाभ होता है।

डायबिटीज में फायदेमंद करेले का सेवन
डायबिटीज से दुनिया भर में अनेक लोग पीड़ित हैं। करेला से डायबिटीज में फायदा मिलता है। करेला के फलों को सुखाकर महीन चूर्ण बना लें। इसे 3-6 ग्राम की मात्रा में जल, या शहद के साथ सेवन करें। इससे मधुमेह में लाभ होता है। यह अग्नाशय को स्वस्थ बनाकर इंसुलिन के उत्पादन को सही करने में मदद पहुंचाता है।
ताजे करेले के फल के रस में अनेक पोषक तत्व होते हैं। इसकी 10-15 मिली मात्रा पीने से भी मधुमेह में बहुत लाभ होता है।
इसके अलावा, 20 मिली करेला के फल के रस में, 20 मिली आँवला के रस को मिला लें। इसे रोज सुबह-सुबह 4-6 माह तक नियमित सेवन करें। इससे मधुमेह में तुरंत लाभ होता है।

बवासीर में फायदेमंद करेला का प्रयोग
करेला का सेवन करना बवासीर में लाभदायक होता है। बवासीर से परेशान लोग, करेले की जड़ को घिसकर मस्सों पर लेप करेंं। इससे बवासीर में लाभ मिलता है।
इसी तरह 15-20 मिली करेला के पत्ते के रस को 200-300 मिली छाछ के साथ रोजाना सुबह-सुबह सेवन करें। एक माह तक सेवन करने से बवासीर में फायदा होता है।

करेला से खूनी बवासीर में फायदा
करेला में मौजूद पोषक तत्व खूनी बवासीर में भी लाभ पहुंचाते हैं। खूनी बवासीर वाले लोग 20-30 मिली करेले के काढ़े में चीनी मिला लें। इसे सुबह-शाम पीएं। इससे खूनी बवासीर में लाभ होता है।

करेला के उपयोग से पीलिया में फायदा
पीलिया से ग्रस्त लोग करेले के इस्तेमाल से लाभ ले सकते हैं। 10-15 मिली करेला के पत्ते के रस में, बड़ी हरड़ को घिस लें। इसे पिलाने से पीलिया रोग में लाभ होता हैं।

गठिया में फायदेमंद करेला का इस्तेमाल
गठिया रोग में व्यक्ति को बहुत अधिक पीड़ा झेलनी पड़ती है। इस रोग के कारण रोगी का शरीर सामान्य रूप से गतिशील नहीं रह पाता है। ऐसे में करेले के कच्चे हरे फलों के रस को गर्म कर लें। इसका लेप करने से गठिया में लाभ होता है।
इसी तरह करेले के पेस्ट, और काढ़ा को घी में पकाकर दर्द वाले स्थान पर लगाने से भी गठिया में आराम मिलता है।
इसके अलावा 10-15 मिली करेला के फल के रस, या पत्ते के रस में राई, और स्वाद के अनुसार नमक मिला लें। इसे पीने से गठिया में फायदा होता है।
आप करेले के फल को आग पर 10 मिनट रखकर भुर्ता बना लें। इसमें शक्कर मिलाकर रोगी को गुनगुना कर खिला दें। इसे करीब 125 ग्राम की मात्रा में सुबह-शाम रोगी को गर्म-गर्म खिलाएं। इससे गठिया में आराम होता है। पीड़ा वाले स्थान पर फलों के रस का बार-बार लेप करने से भी गठिया में आराम होता है।

लिवर विकार में फायदेमंद करेला का प्रयोग
जो लोग शराब का अधिक सेवन करते हैं, और इससे होने वाली बीमारी से परेशान हैं। वे लोग छाछ के साथ 15-20 मिली करेला के पत्ते के रस का सेवन करें। इससे अधिक शराब पीने के कारण होने वाली लिवर की बीमारी में लाभ मिलता है।

सार:
करेला के उपयोगी भाग
करेला का इस्तेमाल इस तरह किया जा सकता हैः-

जड़
पत्ते
फल
पौधा
करेला का इस्तेमाल कैसे करें?
आप करेला का सेवन इतनी मात्रा में कर सकते हैंः-

करेला का रस- 10-20 मिली
करेला का चूर्ण- 5 ग्राम
किसे करेला का सेवन नहीं करना चाहिए?
अब तक आपने जाना कि, करेला कैसे, और कितने तरीके से शरीर के लिए फायदेमंद हो सकता है। अब यह जानना भी बहुत जरूरी है कि किन लोगों को करेला का सेवन नहीं करना चाहिएः-

लो ब्लडशुगर लेवल से पीड़ित रोगियों, एवं बच्चों को इसका सेवन नहीं करना चाहिए।
करेला के बीज में कुछ नुकसानदेह पदार्थ भी होते हैं, जिससे गर्भपात होने की संभावना रहती है। इसलिए लगातार करेले का प्रयोग नहीं करना चाहिए।

करेले का साइड इफेक्ट
बहुत अधिक मात्रा में करेला का सेवन करने से पेट में दर्द, और दस्त की समस्या हो सकती है। अगर ऐसी परेशानी हो रही हो तो चावल और घी खिलाना अच्छा होता है।

करेला कहां पाया या उगाया जाता है?
चूंकि करेला एक सब्जी है, इसलिए इसकी खेती पूरे भारत में की जाती है। यह सब्जी मार्केट में यह आसानी से मिल जाती है।
#सदा_स्वस्थ_रहें

01/06/2024

🥛कभी भी गिलास में पानी ना पियें,

जानिए लोटे और गिलास के पानी में अंतर

🥛भारत में हजारों साल की पानी पीने की जो सभ्यता है वो गिलास नही है,

ये गिलास जो है विदेशी है. गिलास भारत का नही है.

गिलास यूरोप से आया. और यूरोप में पुर्तगाल से आया था.

ये पुर्तगाली जबसे भारत देश में घुसे थे तब से गिलास में हम फंस गये. गिलास अपना (भारत का) नहीं हैं।

अपना लोटा है. और लोटा कभी भी एकरेखीय नही होता.

वागभट्ट जी कहते हैं कि जो बर्तन एकरेखीय हैं उनका त्याग कीजिये. वो काम के नही हैं.
इसलिए गिलास का पानी पीना अच्छा नही माना जाता.

लोटे का पानी पीना अच्छा माना जाता है.

इस पोस्ट में हम गिलास और लोटे के पानी पर चर्चा करेंगे और दोनों में अंतर बताएँगे.
🥛
फर्क सीधा सा ये है कि आपको तो सबको पता ही है कि पानी को जहाँ धारण किया जाए, उसमे वैसे ही गुण उसमें आते है.

पानी के अपने कोई गुण नहीं हैं. जिसमें डाल दो उसी के गुण आ जाते हैं.

दही में मिला दो तो छाछ बन गया, तो वो दही के गुण ले लेगा. दूध में मिलाया तो दूध का गुण.
🥛
लोटे में पानी अगर रखा तो बर्तन का गुण आयेगा. अब लौटा गोल है तो वो उसी का गुण धारण कर लेगा.

और अगर थोडा भी गणित आप समझते हैं तो हर गोल चीज का सरफेस टेंशन कम रहता है.

क्योंकि सरफेस एरिया कम होता है तो सरफेस टेंशन कम होगा. तो सरफेस टेंशन कम हैं तो हर उस चीज का सरफेस टेंशन कम होगा.

और स्वास्थ्य की दष्टि से कम सरफेस टेंशन वाली चीज ही आपके लिए लाभदायक है.

अगर ज्यादा सरफेस टेंशन वाली चीज आप पियेंगे तो बहुत तकलीफ देने वाला है. क्योंकि उसमें शरीर को तकलीफ देने वाला एक्स्ट्रा प्रेशर आता है.

🥛
गिलास और लोटे के पानी में अंतर
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गिलास के पानी और लोटे के पानी में जमीं आसमान का अंतर है. इसी तरह कुंए का पानी, कुंआ गोल है इसलिए सबसे अच्छा है.

आपने थोड़े समय पहले देखा होगा कि सभी साधू संत कुए का ही पानी पीते है. न मिले तो प्यास सहन कर जाते हैं,

जहाँ मिलेगा वहीं पीयेंगे. वो कुंए का पानी इसीलिए पीते है क्यूंकि कुआ गोल है, और उसका सरफेस एरिया कम है.

सरफेस टेंशन कम है. और साधू संत अपने साथ जो केतली की तरह पानी पीने के लिए रखते है वो भी लोटे की तरह ही आकार वाली होती है.
🥛
सरफेस टेंशन कम होने से पानी का एक गुण लम्बे समय तक जीवित रहता है.

"पानी का सबसे बड़ा गुण है सफाई करना".

अब वो गुण कैसे काम करता है वो आपको बताते है. आपकी बड़ी आंत है और छोटी आंत है,
आप जानते हैं कि उसमें मेम्ब्रेन है और कचरा उसी में जाके फंसता है. पेट की सफाई के लिए इसको बाहर लाना पड़ता है.

ये तभी संभव है जब कम सरफेस टेंशन वाला पानी आप पी रहे हो. अगर ज्यादा सरफेस टेंशन वाला पानी है तो ये कचरा बाहर नही आएगा, मेम्ब्रेन में ही फंसा रह जाता है.

दुसरे तरीके से समझें, आप एक एक्सपेरिमेंट कीजिये. थोडा सा दूध ले और उसे चेहरे पे लगाइए, 5 मिनट बाद रुई से पोंछिये. तो वो रुई काली हो जाएगी.

स्किन के अन्दर का कचरा और गन्दगी बाहर आ जाएगी. इसे दूध बाहर लेकर आया.

अब आप पूछेंगे कि दूध कैसे बाहर लाया तो आप को बता दें कि दूध का सरफेस टेंशन सभी वस्तुओं से कम है.
तो जैसे ही दूध चेहरे पर लगाया,
दूध ने चेहरे के सरफेस टेंशन को कम कर दिया .

क्योंकि जब किसी वस्तु को दूसरी वस्तु के सम्पर्क में लाते है तो वो दूसरी वस्तु के गुण ले लेता है.
🥛
इस एक्सपेरिमेंट में दूध ने स्किन का सरफेस टेंशन कम किया और त्वचा थोड़ी सी खुल गयी.

और त्वचा खुली तो अंदर का कचरा बाहर निकल गया. यही क्रिया लोटे का पानी पेट में करता है.

आपने पेट में पानी डाला तो बड़ी आंत और छोटी आंत का सरफेस टेंशन कम हुआ और वो खुल गयी और खुली तो सारा कचरा उसमें से बाहर आ गया.

जिससे आपकी आंत बिल्कुल साफ़ हो गई.

अब इसके विपरीत अगर आप गिलास का हाई सरफेस टेंशन का पानी पीयेंगे तो आंते सिकुडेंगी क्यूंकि तनाव बढेगा.

तनाव बढते समय चीज सिकुड़ती है और तनाव कम होते समय चीज खुलती है.

अब तनाव बढेगा तो सारा कचरा अंदर जमा हो जायेगा और वो ही कचरा , मुल्व्याद जैसी सेंकडो पेट की बीमारियाँ उत्पन्न करेगा.

इसलिए कम सरफेस टेंशन वाला ही पानी पीना चाहिए.

इसलिए लोटे का पानी पीना सबसे अच्छा माना जाता है, गोल कुए का पानी है तो बहुत अच्छा है.

गोल तालाब का पानी, पोखर अगर खोल हो तो उसका पानी बहुत अच्छा. नदियों के पानी से कुंए का पानी अधिक अच्छा होता है.

क्योंकि नदी में गोल कुछ भी नही है वो सिर्फ लम्बी है, उसमे पानी का फ्लो होता रहता है.

नदी का पानी हाई सरफेस टेंशन वाला होता है और नदी से भी ज्यादा ख़राब पानी समुन्द्र का होता है उसका सरफेस टेंशन सबसे अधिक होता है.

अगर प्रकृति में देखेंगे तो बारिश का पानी गोल होकर धरती पर आता है.

मतलब सभी बूंदे गोल होती है क्यूंकि उसका सरफेस टेंशन बहुत कम होता है.

तो गिलास 🥛की बजाय पानी लोटे में पीयें. लोटे ही घर में लायें. गिलास का प्रयोग बंद कर दें.

तो वागभट्ट जी की बात मानिये और लोटे वापिस लाइए.

#सदा_स्वस्थ_रहें

Photos from JoGee Wellness World's post 01/06/2024

नाभी कुदरत की एक अद्भुत देन है।
एक 62 वर्ष के बुजुर्ग को अचानक बांई आँख से कम दिखना शुरू हो गया। खासकर रात को नजर न के बराबर होने लगी।जाँच करने से यह निष्कर्ष निकला कि उनकी आँखे ठीक है परंतु बांई आँख की रक्त नलीयाँ सूख रही है। रिपोर्ट में यह सामने आया कि अब वो जीवन भर देख नहीं पायेंगे।....
मित्रो यह सम्भव नहीं है..
मित्रों हमारा शरीर परमात्मा की अद्भुत देन है...गर्भ की उत्पत्ति नाभी के पीछे होती है और उसको माता के साथ जुडी हुई नाडी से पोषण मिलता है और इसलिए मृत्यु के तीन घंटे तक नाभी गर्म रहती है।
गर्भधारण के नौ महीनों अर्थात 270 दिन बाद एक सम्पूर्ण बाल स्वरूप बनता है। नाभी के द्वारा सभी नसों का जुडाव गर्भ के साथ होता है। इसलिए नाभी एक अद्भुत भाग है।
नाभी के पीछे की ओर पेचूटी या navel button होता है।जिसमें 72000 से भी अधिक रक्त धमनियां स्थित होती है
नाभी में गाय का शुध्द घी या तेल लगाने से बहुत सारी शारीरिक दुर्बलता का उपाय हो सकता है।
1. आँखों का शुष्क हो जाना, नजर कमजोर हो जाना, चमकदार त्वचा और बालों के लिये उपाय...
सोने से पहले 3 से 7 बूँदें शुध्द घी और नारियल के तेल नाभी में डालें और नाभी के आसपास डेढ ईंच गोलाई में फैला देवें।

2. घुटने के दर्द में उपाय
सोने से पहले तीन से सात बूंद अरंडी का तेल नाभी में डालें और उसके आसपास डेढ ईंच में फैला देवें।

3. शरीर में कमपन्न तथा जोड़ोँ में दर्द और शुष्क त्वचा के लिए उपाय :-
रात को सोने से पहले तीन से सात बूंद राई या सरसों कि तेल नाभी में डालें और उसके चारों ओर डेढ ईंच में फैला देवें।

4. मुँह और गाल पर होने वाले पिम्पल के लिए उपाय:-
नीम का तेल तीन से सात बूंद नाभी में उपरोक्त तरीके से डालें।

नाभी में तेल डालने का कारण:
हमारी नाभी को मालूम रहता है कि हमारी कौनसी रक्तवाहिनी सूख रही है,इसलिए वो उसी धमनी में तेल का प्रवाह कर देती है।
जब बालक छोटा होता है और उसका पेट दुखता है तब हम हिंग और पानी या तैल का मिश्रण उसके पेट और नाभी के आसपास लगाते थे और उसका दर्द तुरंत गायब हो जाता था।बस यही काम है तेल का।
अपने स्नेहीजनों, मित्रों और परिजनों में इस नाभी में तेल और घी डालने के उपयोग और फायदों को शेयर करिये।
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01/06/2024

ब्राह्मी के लाभ सभी तक पहुंचायें
आप स्वस्थ हों देश स्वस्थ हो और साथ ही अपना व देश का करोड़ों रुपये बचायें
ब्राह्मी (जलनीम): बहुत गुणकारी है -
वानस्पतिक नाम : Bacopa monnieri (Linn.)

Wettst. (बैकोपा मोनिएरी)

Syn-Herpestis monnieri (Linn.) Kunth

कुल : Scrophulariaceae

(क्रोफूलेरिएसी)

अंग्रेज़ी नाम : Bacopa (बैकोपा)

संस्कृत-कपोतवङ्का, सोमवल्ली, सरस्वती, ब्राह्मी, ऐद्री; हिन्दी-ब्राह्मी, जलनीम; उड़िया-ब्राम्ही (Brahmi); असमिया-ब्रह्मी (Brahmi); कन्नड़-नीरब्राह्मी (Neerbrahmi), ओडेगल (Audegal); गुजराती-जल ब्राह्मी (Jal brahmi); तमिल-नीराब्रह्मी (Neerabrahmi); तेलुगु-शम्ब्रनी चेट्टु (Shambrini chettu); बंगाली-ब्राह्मीशाक (Brahmishak); नेपाली-मेधा गिरी (Medha giree); मराठी-ब्राह्मी (Brahmi); मलयालम-बार्ना (Barna); मणिपुरी-ब्रह्मी-साक (Brahmi-sak)।

अंग्रेजी-वाटर हायस्सोप (Water hyssop), बेबी टियरस् (Baby tears)।

परिचय

यह वनस्पति समस्त भारत में आर्द्र एवं दलदली भूमि पर लगभग 1200 मी की ऊँचाई तक पाई जाती है। बंगाल में इसका अधिक प्रयोग किया जाता है, अत इसे बंगीय ब्राह्मी भी कहते है। जल के समीप पैदा होने तथा स्वाद में नीम जैसी कड़वी होने की वजह से इसे जलनीम भी कहा जाता है। इसका पौधा लगभग 10-30 सेमी लम्बा, भूमि पर फैलने वाला, मांसल तथा शाखा-प्रशाखाओं से युक्त होता है। इसकी पत्तियाँ मांसल तथा चिपचिपे स्राव से युक्त होती हैं। इसके पुष्प श्वेत अथवा गहरे नीलाभ वर्ण के होते हैं। इसकी फली लम्बी, अण्डाकार, चिकनी तथा नुकीली होती हैं।

आयुर्वेदीय गुण-कर्म एवं प्रभाव

ब्राह्मी कषाय, मधुर, तिक्त, शीत, लघु, कफवातशामक, आयुवर्धक, बुद्धिवर्धक, रसायन, स्वरवर्धक, वयस्थापक, दीपन, सर, स्मृतिवर्धक, प्रजास्थापन, कंठशोधक तथा हृद्य होती है।
यह कुष्ठ, पाण्डु, प्रमेह, शोथ, विष, ज्वर, कण्डू, प्लीहा रोग, अरुचि, श्वास, कास, मोह, उन्माद, हृदयरोग, अग्निमांद्य, विबन्ध, दौर्बल्य एवं वातरक्त नाशक होती है।
इसका पञ्चाङ्ग प्रशामक, पेशीशैथिल्यकारक, उद्वेष्टरोधी, कर्कटार्बुदरोधी, वेदनाशामक, स्तम्भक, हृदयबलकारक, मूत्रल, मस्तिष्क बलकारक, विरेचक, वातानुलोमक, पाचक, शोथरोधी, आक्षेपरोधी, शोधक, श्वसनी-विस्फारक, स्वेदकारक, आर्तववर्धक तथा ज्वरघ्न होता है।
इसके पत्र मृदु विरेचक, मूत्रल तथा मेध्य होते हैं।
औषधीय प्रयोग मात्रा एवं विधि

तोतलापन-ब्राह्मी की पत्तियों को चबाने से तोतलापन ठीक होता है।
श्वसनीशोथ-5 मिली ब्राह्मी पत्र-स्वरस का सेवन करने से श्वसनी-शोथ में लाभ होता है।
रक्तज-अतिसार-5 मिली ब्राह्मी स्वरस या 1-2 ग्राम ब्राह्मी चूर्ण का सेवन कराने से रक्तज अतिसार का शमन होता है।
मूत्रदाह-5 मिली ब्राह्मी स्वरस को जल के साथ मिलाकर सेवन करने से मूत्रदाह तथा मूत्रकृच्छ्र में लाभ होता है।
प्रसवोत्तर शूल-ब्राह्मी के उबले पत्रों का सेवन करने से प्रसव के पश्चात् होने वाली वेदना का शमन होता है।
आमवात-ब्राह्मी के पत्र को पीसकर लगाने से आमवात में लाभ होता है।
2 ग्राम ब्राह्मी चूर्ण को मधु के साथ सेवन करने से आमवात का शमन होता है।
वातरक्त-1-2 ग्राम ब्राह्मी चूर्ण को गुनगुने जल के साथ सेवन करने से वातरक्त में लाभ होता है।
मसूरिका-5 मिली ब्राह्मी-स्वरस में मधु मिलाकर सेवन करने से दोषों का निर्हरण हो कर मसूरिका का शमन होता है।
शोथ-ब्राह्मी के पत्रों को पीसकर, गुनगुना करके सूजन में लगाने से सूजन मिटती है।
उन्माद-5 मिली ब्राह्मी-स्वरस में कूठ चूर्ण तथा मधु मिलाकर सेवन करने से उन्माद में लाभ होता है।
अपस्मार-ब्राह्मी पत्र स्वरस, वचा, कूठ एवं शंखपुष्पी के कल्क से यथाविधि घृत-पाक कर मात्रानुसार सेवन करने से उन्माद, मिरगी आदि रोगों में लाभ होता है।
सन्निपात ज्वर-समभाग ब्राह्मी, बेलमूल, कूठ तथा शंखपुष्पी चूर्ण (1-2 ग्राम) में मधु मिलाकर सेवन करने से सन्निपात-ज्वर के कारण उत्पन्न वाक् विकारों का शमन होकर स्वर स्पष्ट होता है।
शीतपित्त-जलनीम पञ्चाङ्ग में समभाग काली मरिच मिलाकर पीसकर 125 मिग्रा की गोलियां बना लें, 2-2 गोली प्रात सायं सेवन करने से शीतपित्त में लाभ होता है।
बालातिसार-5 मिली ब्राह्मी पत्र-स्वरस का सेवन करने से बालातिसार का शमन होता है।
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01/06/2024

वृक्षाम्ला के लाभ सभी तक पहुंचायें
आप स्वस्थ हों देश स्वस्थ हो और साथ ही अपना व देश का करोड़ों रुपये बचायें
बहुत गुणकारी है वृक्षाम्ला –
1 वृक्षाम्ल का परिचय
2 वृक्षाम्ल क्या है
3 अनेक भाषाओं में वृक्षाम्ल के नाम
4 वृक्षाम्ल के फायदे
4.1 मोटापा कम करने में वृक्षाम्ल फायदेमंद
4.2 सूखी खाँसी को ठीक करता है वृक्षाम्ल
4.3 अधिक प्यास लगने की परेशानी को ठीक करता है वृक्षाम्ल
4.4 गले के रोग में वृक्षाम्ल से लाभ
4.5 दस्त को रोकने के लिए करें कोकम का प्रयोग
4.6 पेचिश में कोकम से फायदा
4.7 एसिडिटी की परेशानी से कोकम से लाभ
4.8 खूनी बवासीर का कोकम से इलाज
4.9 फटी त्वचा की परेशानी में कोकम का इस्तेमाल लाभदायक
4.10 पित्ती उछलना में कोकम का प्रयोग फायदेमंद
4.11 टी.बी. रोग में लाभ पहुंचाता है कोकम
4.12 कमजोरी दूर करता है कोकम
4.13 अधिक शराब पीने से होने वाली बीमारी में लाभदायक वृक्षाम्ल
5 वृक्षाम्ल से नुकसान
6 वृक्षाम्ल के सेवन की मात्रा
7 वृक्षाम्ल के सेवन का तरीका
8 वृक्षाम्ल कहां पाया या उगाया जाता है
वृक्षाम्ल का परिचय
वृक्षाम्ल एक जड़ी-बूटी है। सदियों से आयुर्वदाचार्य वृक्षाम्ल का प्रयोग कर बीमारी को ठीक करने का काम करते आ रहे हैं। वृक्षाम्ल को कोकम भी कहा जाता है। कई लोग इस वृक्षाम्ल के नाम से जानते हैं तो अनेक स्थानों पर इसे कोकम भी कहा जाता है। आपके लिए कोकम के इस्तेमाल की यह जानकारी बहुत ही महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे आप भी बीमारियों को ठीक करने जैसा फायदा ले सकते हैं।

आयुर्वेद में यह बताया गया है कि कोकम या वृक्षाम्ल भूख बढ़ाने वाला, कफ तथा वात बढ़ाने वाला होता है। यह कब्ज, प्यास, बवासीर, गले की बीमारी, दर्द आदि दूर करता है। हृदय रोग में लाभदायक होता है। पेट के कीड़े को खत्म करता है। घाव को ठीक करता है। इसके अलावा भी कोकम या वृक्षाम्ल के लाभ और भी हैं। आइए सभी के बारे में जानते हैं।

वृक्षाम्ल क्या है
यह एक सदाबहार वृक्ष होता है जिसकी शाखाएं छोटी और फैली हुई होती हैं। इसके फल गोलाकार, 2.5-3.8 से.मी. व्यास के होते हैं। फल पकने पर गहरे बैंगनी रंग के तथा उनमें 5-8 चिकने, चमकीले, भूरे रंग के बीज होते हैं। बीज निकालकर सुखाए हुए फल को कोकम या वृक्षाम्ल कहा जाता है। इसके बीजों से जो तेल निकलता है, वह मोम के समान जम जाता है।

वृक्षाम्ल का कच्चा फल खट्टा, वात एवं कफ की परेशानी को ठीक करने वाला तथा पित्त को उत्पन्न करने वाला होता है। इसका पका हुआ फल खट्टा तथा पचने में हल्का होता है। फल के छिलके से प्राप्त तत्व गार्सिनॉल के प्रयोग से रक्त कैंसर HL 60 कोशिकाओं को खत्म होता देखा गया है। इसके गूदे का सार वीर्य को गाढ़ा करता है और शरीर के केंद्रीय न्यूरो सिस्टम को प्रभावित करता है। इसमें एंटीऑक्सीडेंट होता है।

अनेक भाषाओं में वृक्षाम्ल के नाम
कुटकी का लैटिन नाम गारर्सीनिया इण्डिका (Garcinia indica (Thouars) Choisy., Syn-Garcinia purpurea Roxb.) है और यह क्लूसिऐसी कुल का है। देश-विदेश में कुटकी को अन्य अनेक नामों से भी जाना जाता है, जो ये हैंः-

इंग्लिश में
ब्रिन्दोनीआ टेलौव ट्री (Brindonia tallow tree), मेंगोस्टीन ऑयल ट्री (Mangosteen oil tree), वाइल्ड मेंगोस्टीन (Wild mangosteen), Kokam butter tree (कोकम बटर ट्री)
Sanskrit – वृक्षाम्ल, अम्लवृक्षक
Hindi – कोकम, विषांविल
Konkani – बिरोड (Birondd), बिरोंडी (Birondi)
Kannada – कोकममारा (Kokammara), धूपदामरा (Dhupadamara)
Gujarati – कोकन (Kokan)
Tamil – मुर्गल (Murgal), मुर्गलमरा (Murgalmera)
Nepali – रातम्बा (Ratamba), कोकम (Kokam)
Marathi – अमसोल (Amsole), कोकम (Kokam)
Malayalam – अमसूल (Amasul), कोकम (Kokam), पुनमफली (Punampuli)
वृक्षाम्ल के फायदे

वृक्षाम्ल का औषधीय प्रयोग, प्रयोग की मात्रा और विधियां ये हैंः-

मोटापा कम करने में वृक्षाम्ल फायदेमंद

वृक्षाम्ल यानी कोकम वजन कम करने के लिए बहुत लाभकारी है। लगभग 400 ग्राम कोकम के फल को चार लीटर पानी में डालकर एक चौथाई बचने तक उबालें। इसे छान लें और ठंडे स्थान पर रख दें। रोजाना सुबह इस रस को खाली पेट 100 मिली की मात्रा में सेवन करें। एक माह में ही वजन कम होगा।

सूखी खाँसी को ठीक करता है वृक्षाम्ल
वृक्षाम्ल के पत्तों को बताशों के साथ बार-बार चबाने से सूखी खांसी में काफी लाभ होता है।

अधिक प्यास लगने की परेशानी को ठीक करता है वृक्षाम्ल

वृक्षाम्ल के रस को मुंह में रखकर देर तक रख कर कुल्ला करने से अधिक प्यास लगाने की समस्या में लाभ होता है।

गले के रोग में वृक्षाम्ल से लाभ

कोकम के रस (यदि रस न प्राप्त हो तो इसका काढ़ा लें) में सेन्धा नमक डालकर पीने से गले के गाँठ की समस्या ठीक हो जाती है।

दस्त को रोकने के लिए करें कोकम का प्रयोग

वृक्षाम्ल, अनार के बीज, हींग, विड्नमक, पंचमूल, बेल, जीरा, धनिया, पिप्पली आदि द्रव्यों के साथ विधिपूर्वक चूरन बना लें। इसका विशेष अन्नपान भूख बढ़ाती है। यह पाचक, ताकत बढ़ाने वाला एवं रोचक होता है।

750 ग्राम वृक्षाम्ल फल में लगभग 300 ग्राम मिश्री तथा 35 ग्राम जीरा मिलाकर, चूर्ण बना लें। इसका सेवन करने से कब्ज नष्ट होता है और भोजन के प्रति रुचि उत्पन्न होती है।

पेचिश में कोकम से फायदा

वृक्षाम्ल के ताजे फल के 5-10 ग्राम गूदे को खिलाने से खूनी पेचिश में लाभ होता है।

वृक्षाम्ल बीज के 5 मि.ली. कोकम तेल को 200 मि.ली. दूध में मिलाकर पिलाने से पेचिश तथा खूनी पेचिश में लाभ होता है।

सूखे फल के 2-3 ग्राम चूर्ण में घी तथा कोकम तेल मिलाकर गुनगुना करके सेवन करें। इससे दर्द तथा गैसयुक्त पेचिश में लाभ होता है।

एसिडिटी की परेशानी से कोकम से लाभ

वृक्षाम्ल फल के चूर्ण में छोटी इलायची के दाने और शक्कर मिला लें। इसे चटनी बनाकर भोजन के साथ सेवन करने से एसिडिटी में लाभ होता है।

खूनी बवासीर का कोकम से इलाज

वृक्षाम्ल फल से बनी चटनी या चूर्ण को दही में मिलाकर सेवन करें। इससे खूनी बवासीर में होने वाला रक्तस्राव बंद हो जाता है।

फटी त्वचा की परेशानी में कोकम का इस्तेमाल लाभदायक
वृक्षाम्ल के बीज का तैल लगाने से होंठ, हाथ तथा पैरों की त्वचा के फटने में लाभ होता है।

पित्ती उछलना में कोकम का प्रयोग फायदेमंद
अगर आपको एलर्जी की तरह पित्त निकलने की बीमारी है तो वृक्षाम्ल की छाल या फल के रस से मालिश करने से पित्तियाँ बैठ जाती हैं।

टी.बी. रोग में लाभ पहुंचाता है कोकम
धनिया (1 भाग), श्वेत जीरा (2 भाग), सौवर्चल नमक (1 भाग), सोंठ (1/4 भाग) तथा कपित्थ के गुदे (5 भाग) के सूक्ष्म चूर्ण में 16 भाग चीनी मिला लें। इसका सेवन करने से भूख की कमी तथा दस्त से पीड़ित टी.बी. रोगी को काफी लाभ होता है।

कमजोरी दूर करता है कोकम
वृक्षाम्ल आदि द्रव्यों से बने सैंधवादि चूर्ण को 1-3 ग्राम मात्रा में सेवन करें। इससे लंबी बीमारी के कारण हुई कमजोरी दूर होती है। यह चूर्ण काफी रुचिवर्धक व शक्ति बढ़ाने वाला होता है।

अधिक शराब पीने से होने वाली बीमारी में लाभदायक वृक्षाम्ल
अधिक शराब पीने वाले लोग कई प्रकार के रोग से ग्रस्त हो जाते हैं। ऐसे लोगों को प्यास लगना, अनिद्रा, भूख की कमी आदि की समस्या होने लगती है। ऐसे में जंगली बेर, अनार, वृक्षाम्ल, चांगेरी तथा चूका के मिश्रित रस को मुंह के अंदर लेप के रूप में लगाएं। इससे शराब पीने के कारण लगी प्यास शांत हो जाती है।

सौवर्चल नमक, जीरा, वृक्षाम्ल तथा अम्लवेतस बराबर मात्रा में लेकर उसमें आधा-आधा भाग दालचीनी, इलायची, काली मिर्च तथा एक भाग चीनी मिला लें। इसका चूर्ण बना लें। इसका सेवन करने से भूख बढ़ती है और शरीर स्वस्थ रहता है।

वृक्षाम्ल से नुकसान
उच्च रक्तचाप (हाई ब्लडप्रेशर) के रोगियों को वृक्षाम्ल का सेवन नहीं करना चाहिए। इसके जमे हुए तेल के प्रयोग से कई बार चर्म रोग भी होते हैं।

वृक्षाम्ल के सेवन की मात्रा
औषधि के रूप में कोकम का इस्तेमाल करने के लिए चिकित्सक के परामर्शानुसार कोकम का प्रयोग करें।

वृक्षाम्ल के सेवन का तरीका
औषधि के रूप में कोकम का इस्तेमाल करने के लिए चिकित्सक के परामर्शानुसार कोकम का प्रयोग करें।

वृक्षाम्ल कहां पाया या उगाया जाता है
वृक्षाम्ल भारत में पश्चिमी घाट से दक्षिण पश्चिमी महाराष्ट्र, दक्षिणी कर्नाटक, केरल तथा पश्चिमी तमिलनाडू के सदाबहार जंगलों में पाया जाता है। महाराष्ट्र में तेल के लिए इसकी खेती की जाती है।
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