Rohit sir m

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15/06/2026

जीवन साथी

08/06/2026

मैं आठ ग्रहों (बुध, शुक्र, पृथ्वी, मंगल, बृहस्पति, शनि, अरुण और वरुण) में से पृथ्वी। पृथ्वी जिसका 71% जल और 29% स्थल है। 29% स्थलीय भाग जो सात महादेशों में बँटा हुआ है। उन्हीं में से एक महादेश एशिया महादेश के लगभग 200 देशों में से एक देश भारत। भारत जो 28 राज्यों और 8 केंद्रशासित प्रदेश में बँटा हुआ है के बिहार राज्य के 38 जिला, 9 प्रमंडल, 101 अनुमंडल में से कोशी प्रमंडल के मधेपुरा अनुमंडल के एक प्रखंड सिंहेश्वर के एक ग्राम मानपुर का निवासी हूँ।

लेकिन यह तो केवल मेरा भौगोलिक परिचय है। यदि वास्तविक परिचय की बात करूँ तो मैं एक ऐसा साधारण व्यक्ति हूँ जो जीवन को समझने और स्वयं को जानने की निरंतर कोशिश कर रहा है। मेरा जन्म जिस मिट्टी में हुआ, उसने मुझे संस्कार दिए; जिन लोगों के बीच मैं बड़ा हुआ, उन्होंने मुझे समाज को समझना सिखाया; और जिन परिस्थितियों का सामना किया, उन्होंने मुझे जीवन का अर्थ समझाने का प्रयास किया।

मैं मानता हूँ कि किसी व्यक्ति का परिचय केवल उसके गाँव, जिला, राज्य या देश से पूरा नहीं होता। उसका वास्तविक परिचय उसके विचारों, उसके कर्मों, उसके व्यवहार और उसके द्वारा समाज में छोड़े गए प्रभाव से बनता है। आज मैं मानपुर गाँव का निवासी हूँ, कल किसी और स्थान पर रह सकता हूँ, लेकिन मेरे विचार, मेरा चरित्र और मेरे कर्म ही मेरी सच्ची पहचान बनेंगे।

इस विशाल ब्रह्मांड में मेरी उपस्थिति एक बिंदु के समान है, फिर भी मेरे लिए मेरा जीवन उतना ही महत्वपूर्ण है जितना किसी भी अन्य व्यक्ति का। मैं सीख रहा हूँ, समझ रहा हूँ, गलतियों से अनुभव प्राप्त कर रहा हूँ और स्वयं को बेहतर बनाने का प्रयास कर रहा हूँ।

इसलिए मेरा परिचय केवल इतना नहीं कि मैं मानपुर गाँव का निवासी हूँ, बल्कि यह भी है कि मैं सत्य की खोज में लगा एक जिज्ञासु मन, सीखने वाला एक विद्यार्थी और मानवता को समझने का प्रयास करता हुआ एक साधारण इंसान हूँ।

07/06/2026

# समर्पण की ऊँचाई पात्रता पर निर्भर करती है

समर्पण मनुष्य के जीवन का एक अत्यंत सुंदर भाव है। जब हम किसी व्यक्ति, कार्य, विचार या लक्ष्य के प्रति स्वयं को समर्पित करते हैं, तो उसमें अपना समय, ऊर्जा, भावना और विश्वास लगाते हैं। लेकिन समर्पण की सफलता केवल समर्पित करने वाले पर ही निर्भर नहीं करती, बल्कि उस पात्र की पात्रता पर भी निर्भर करती है जिसके प्रति समर्पण किया जा रहा है।

यदि किसी योग्य व्यक्ति, श्रेष्ठ विचार या सार्थक उद्देश्य के प्रति समर्पण किया जाए, तो वही समर्पण हमें ऊँचाइयों तक ले जाता है। गुरु के प्रति शिष्य का समर्पण उसे ज्ञान की ऊँचाइयों तक पहुंचा सकता है, सत्य के प्रति समर्पण व्यक्ति को चरित्रवान बना सकता है और किसी महान लक्ष्य के प्रति समर्पण जीवन को अर्थपूर्ण बना सकता है।

इसके विपरीत यदि समर्पण किसी अयोग्य व्यक्ति, संकीर्ण विचार या गलत उद्देश्य के प्रति हो, तो वही समर्पण दुख, निराशा और पतन का कारण बन सकता है। तब व्यक्ति जितना अधिक समर्पित होता है, उतनी ही अधिक चोट और हताशा उसे मिलती है। इसलिए समर्पण से पहले यह देखना आवश्यक है कि जिस व्यक्ति या उद्देश्य के प्रति हम स्वयं को अर्पित कर रहे हैं, वह वास्तव में उसके योग्य है भी या नहीं।

नदी जब समुद्र में समर्पित होती है तो उसकी विशालता बढ़ जाती है, लेकिन यदि वह किसी छोटे गड्ढे में गिर जाए तो उसका अस्तित्व ही सीमित हो जाता है। ठीक इसी प्रकार हमारे समर्पण की ऊँचाई भी उस पात्र की विशालता और पात्रता पर निर्भर करती है जिसे हम अपना समर्पण दे रहे हैं।

इसलिए जीवन में केवल समर्पण करना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि सही पात्र का चयन करना उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है। योग्य पात्र के प्रति किया गया समर्पण व्यक्ति को विकसित करता है, जबकि अयोग्य पात्र के प्रति किया गया समर्पण उसे बांध देता है। समर्पण की महत्ता तभी है जब वह सही दिशा में और सही पात्र के प्रति हो, क्योंकि आपके समर्पण को कितनी ऊँचाई मिलेगी, यह अंततः उस पात्र की पात्रता पर ही निर्भर करता है।

29/05/2026

निंदा वही व्यक्ति करता है
जिस पर आपने कभी एहसान किया हो,
क्योंकि एहसान का बोझ
अक्सर आदमी सह नहीं पाता।

जिस हाथ ने उसे संभाला था,
उसी हाथ को झटकने की कोशिश करता है,
ताकि उसे बार-बार अपनी कमी
और दूसरे की अच्छाई याद न आए।

कुछ लोग कृतज्ञता सीखते हैं,
तो कुछ भीतर ही भीतर जलते रहते हैं।
वे सामने मुस्कुराते हैं,
लेकिन पीछे शब्दों से वार करते हैं।

अहंकार को सबसे ज़्यादा चोट
उपकार से लगती है,
क्योंकि उपकार इंसान को
उसकी वास्तविक स्थिति दिखा देता है।

फिर शुरू होती है निंदा,
झूठी बातें, दूरी और विरोध,
ताकि वह खुद को यह समझा सके
कि सामने वाला इतना अच्छा भी नहीं था।

लेकिन सच्चाई यह है कि
उपकार का मूल्य चरित्र से तय होता है।
संस्कार वाले लोग
एक गिलास पानी तक याद रखते हैं,
और स्वार्थी लोग
समंदर भर सहयोग भी भूल जाते हैं।

इसलिए भलाई जरूर कीजिए,
पर आँखें खुली रखकर।
हर किसी को अपना समझ लेना
कभी-कभी सबसे बड़ी भूल बन जाता है।

26/05/2026

बेच दी क्यूँ ज़िंदगी दो-चार आने के लिए
एक दो लम्हा तो रखता मुस्कुराने के लिए

आज का मनुष्य जीवन जी नहीं रहा, बल्कि जीवन को ढो रहा है। इस गजल में आधुनिक जीवन की वही त्रासदी दिखाई देती है जहाँ इंसान ने सुविधाएँ तो बढ़ा लीं, लेकिन मुस्कुराने के क्षण खो दिए।
दो-चार पैसों, पद और दिखावे के पीछे भागते-भागते आदमी अपने ही जीवन से दूर होता जा रहा है। सुबह से रात तक की दौड़ में न स्वयं के लिए समय बचा है, न परिवार के लिए, न माता-पिता के लिए और न ही बच्चों के लिए।

“लंच में फ़ुर्सत नहीं है लंच खाने के लिए” — यह पंक्ति केवल व्यस्तता नहीं, बल्कि जीवन की विडंबना को प्रकट करती है। जिस काम को जीवन आसान बनाने के लिए किया जाता है, वही काम जीवन को कठिन और तनावपूर्ण बना रहा है।

गजल का सबसे मार्मिक पक्ष वह है जहाँ बच्चा गोद में आने के लिए रो रहा है और गाँव में माँ-बाप बेटे को याद कर रहे हैं। यह केवल एक परिवार की कहानी नहीं, बल्कि आज के पूरे समाज की स्थिति है। रिश्ते धीरे-धीरे औपचारिक होते जा रहे हैं। घर अब रहने की जगह तो है, लेकिन अपनापन और संवाद कम होते जा रहे हैं।

अंतिम पंक्तियाँ गहरी चेतावनी देती हैं कि यदि अभी भी हम नहीं संभले, तो केवल मकान बचेंगे, घर नहीं। पैसा कमाना आवश्यक है, लेकिन यदि उसी कमाई की कीमत अपने संबंधों, मुस्कान और मानसिक शांति से चुकानी पड़े, तो यह सौदा घाटे का है।

मेरी ओर से इस गजल का यही अवलोकन है कि —
मनुष्य को केवल जीविका नहीं, जीवन भी बचाना चाहिए।
क्योंकि अंत में इंसान को याद उसके पैसे नहीं, उसके अपने लोग आते हैं।

22/05/2026

Bhagwan Bharose जैसी फ़िल्में समाज के उस चेहरे को सामने लाती हैं, जिसे हम अक्सर “परंपरा” कहकर अनदेखा कर देते हैं। बच्चे जन्म से अंधविश्वासी नहीं होते, उन्हें वैसा बनाया जाता है — डर दिखाकर, पाप-पुण्य की गलत व्याख्या करके, और सवाल पूछने से रोककर।

घर और समाज जब धर्म को समझने के बजाय केवल कर्मकांड, भय और चमत्कार तक सीमित कर देते हैं, तब सबसे ज्यादा नुकसान बच्चों के मन का होता है। वे सत्य को जानने के बजाय डर में जीना सीख जाते हैं। यही बात इस फ़िल्म में बहुत मार्मिक तरीके से दिखाई गई है कि मासूम दिमाग किस तरह वातावरण से प्रभावित होकर भ्रम और अंधविश्वास का शिकार बन जाता है।

धर्म का वास्तविक अर्थ मनुष्य को जागरूक, संवेदनशील और विवेकशील बनाना है, लेकिन जब धर्म का विकृत रूप सामने आता है तो वह प्रश्न पूछने की क्षमता छीन लेता है। फिर इंसान सत्य नहीं खोजता, केवल भीड़ का अनुसरण करता है।

ऐसी फ़िल्मों की सबसे बड़ी खूबी यही है कि वे मनोरंजन के साथ समाज को आईना भी दिखाती हैं। खासकर अभिभावकों और शिक्षकों के लिए यह एक महत्वपूर्ण संदेश है कि बच्चों को डर नहीं, समझ दीजिए; अंधविश्वास नहीं, विवेक दीजिए।

एक अच्छी और विचारोत्तेजक फ़िल्म — जिसे सच में एक बार जरूर देखना चाहिए।

21/05/2026

चिंतन एक विषय है और चिंता एक विकार।
चिंतन हमें समाधान की ओर ले जाता है,
जबकि चिंता हमें उलझनों की ओर धकेल देती है।

चिंतन में विवेक होता है, धैर्य होता है,
और चिंता में भय, असुरक्षा और कल्पनाओं का जाल।

जो व्यक्ति चिंतन करता है,
वह परिस्थिति को समझकर आगे बढ़ता है;
लेकिन जो चिंता में डूब जाता है,
वह बिना कारण ही भीतर से टूटने लगता है।

इसलिए जीवन में समस्याओं से भागना नहीं,
उन पर शांत मन से चिंतन करना सीखिए।
क्योंकि
“चिंता चिता समान है,
और चिंतन जीवन को दिशा देने वाला प्रकाश।”

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