Bastar Herbs

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Vaidya Mohammed Akhtar, Raipur (Chhattisgarh). Free Health n Ayurveda tips. Medicine Made by rare a

🍀 Rare and Very Effective.

💊 एलोपैथी दवाओं के साथ भी खा सकते हैं.. उनके असर को बढ़ा देगी और साइड इफेक्ट को रोकेगी।

⟴ छत्तीसगढ़ प्रदेश का जंगली एरिया 'बस्तर' अभी तक अछूता है और यहां इतने चमत्कारीक लाभ के जड़ी—बुटीयां मिलती हैं जिन पर अभी शोध किया जा रहा है।

⟴ यहां का पर्यावरण एैसा है कि हर्बल्स के इफेक्ट को बढ़ा देती हैं।

☯ बहुंत से हर्बल्स एैसे हैं जो केवल बस्तर के जंगलों में ही होते है

08/05/2026

۞Bile Duct Cancer - 2 【बाईल डक्ट कैंसर】
⌠Cholangiocarcinoma⌡

⊛ आयुर्वेदिक निदान ईलाज का तरीका :

✤ "स्रोतस शोधन" – Bile ducts की सफाई -
बाइल डक्ट का ब्लोकेज अर्बुद के मूल कारणों में से एक है। यदि हम पित्तवह स्रोतस (biliary channels) को साफ़, निर्मल नहीं करेंगे, तो औषधियाँ ठीक से कार्य नहीं कर पाएँगी।

✤ "आमपाचन" –
आम (Undigested toxins) और पित्त का मिलन carcinogenic ( कार्सिनोजेनिक/ कैंसरजनक) प्रक्रिया बनाता है। जब तक आम को नहीं हटाया जाएगा, अर्बुद का बनाना जारी रहेगा ।

✤ "रक्तशोधन" –
रक्त धातु में पित्त और विषविकार होने पर त्वचा, आंखों में पीलापन और शोथ प्रकट होते हैं। इस बिमारी में खून का साफ़ करना भी जरुरी होती है.

✤ "गाँठ नाशक औषधि" –
मेद और कफ की अधिकता से गांठें जल्दी बनती हैं। इसलिए ऐसी औषधी का होना भी जरुरी है जो शरीर के अन्दर जो सेल्स जमा होते हैं उन्हें रोके या दूर करें.

✤ "ओजवर्धन" (रोग प्रतिरोधक शक्ति) –
कैंसर एक ओजक्षयजन्य विकृति है। जब तक ओज को पुनर्स्थापित नहीं किया जाएगा, तब तक थकान, कमजोरी और रोग की पुनरावृत्ति होती रहेगी।

⊛ हमारा बस्तर हर्बल्स में बाइल डक्ट कैंसर के मरीजों के उपचार में यह अनुभव रहा है की इस तरह के रोगी का त्रिदोष को मेंटेन करना चाहिए, लीवर, किडनी, अग्नाशय को साफ़ करना चाहिए उनके विकार दूर करना चाहिए और उसके साथ कैंसर को दूर करने वाली दवाओं का कॉम्बिनेशन करना चाहिए तो अच्छा रिजल्ट आता है.
अगर ऐसा न करके केवल कैंसर की दवाएं दी जाती है तो कोई खास रिजल्ट नहीं आता है क्यूंकि वो दवाएं अच्छे से शरीर में मिल ही नहीं पाती है |

✤ कुछ शब्द जो समझने चाहिए -
✦ Staging (TNM staging) मतलब कैंसर किस स्टेज में है इसके लिए लिखा जाता है |
T = ट्यूमर कितना बड़ा है |
N = लिम्फ नोड में फैला या नहीं |
M = शरीर में दूर तक या दूसरे अंगों में फैला या नहीं |

✦ Resectable / Unresectable मतलब ऑपरेशन हो सकता है या नहीं |
Resectable = सर्जरी से निकाला जा सकता है
Unresectable = सर्जरी संभव नहीं

हालाँकि बहुंत से डॉक्टर/वैद्य/चिकित्सक का अनुभव है की यह कोई खास लाभ नही करता है, ऑपरेशन के बाद भी जल्दी ही कैंसर लौट आता है और वही परेशानी बढ़कर शुरू हो जाती है |

✦ Obstruction (Biliary obstruction) - मतलब पित्त नली में रुकावट आना, ट्यूमर की वजह से bile flow रुक जाता है |

✦ Perihilar / Hilar tumor (Klatskin tumor) - मतलब bile duct के बीच वाले हिस्से का कैंसर जहाँ लीवर से bile duct निकलती है, वहीं गांठ का बनना |

✦ Intrahepatic / Extrahepatic
Intrahepatic = लीवर के अंदर कैंसर
Extrahepatic = लीवर के बाहर bile duct में कैंसर

✦ Tumor Marker (CA 19-9) मतलब खून में मिलने वाला संकेत CA 19-9 बढ़ा हुआ हो तो कैंसर का शक या प्रोग्रेस का अंदाज़ मिलता है |

✦ MRI, MRCP, CT scan, PET scan, से स्टेज देखी जाती है |
क्रमशः...3 ....

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18/12/2025

कैंसर का ईलाज अब महंगा नहीं रहा...
बहुंत से शोध और प्रयोगों के बाद अच्छे योग बनाए जाते हैं लेकिन वह महंगे होते हैं कि
सभी उसे नहीं ले पाते हैं इसलिये हम लोगों ने आर्युवेद की नई पद्धि​ति 'सुक्ष्म औषधि कल्पना'
द्वारा दवाओं का पूर्ननिर्माण किया है जिसमें असर तो वही रहता है लेकिन लागत कम आती है।

» एक माह का पैक मात्र 4500/- से शुरू होकर 16000/- तक का है.. जैसी कीमत वैसा पावर और पोटैंसी रहता है।

कैंसर में अच्छा रिजल्ट देने वाली दवाओं का हमनें 'कैंसर कै​थेलिआन पैक' बनाया है जिसमें —
1. कैंसर कैथेलिआन पावडर 140 ग्रा।
51 तरह के योग/भस्म - हिरक, स्वर्ण, रौप्य, मोती पिष्टी, ताम्र सिंदूर, ताल सिंदूर, रुद्राक्ष, स्वर्ण बसंत मालती, वृहत वात चिंतामणि व्याधिहरण रसायन आदि,
व 10 तरह के औषधियों के घन व 35 तरह के कैंसर रोधी जड़ियों/छालों की भावनाओं द्वारा निर्मित जो कैंसर की किसी भी अवस्था में लाभदायी होता है।

2. कैंसरारि पाव. 140 ग्रा। हिरक, स्वर्ण भस्म, संजीवनी आदि से बना योग जो कैंसर के फैलाव को रोकता है।

3. अनस्ता अर्क 50 मिली ।
लगभग 35 तरह के औषधियों/जड़ियों का निकाला हुआ अर्क जो जीवन शक्ति को बढ़ाता है और कैंसर से लड़ने की ताकत देता है।
शरीर को डिटॉक्स करता है।

4. युवन चूर्ण 70 ग्रा।
कामराज, तेजराज, काली मुसली, सफेद मुसली आदि जंगल की कच्ची जड़ियों से निर्मित जो रोगी को ताकत देता है,
कमजोर शरीर को मजबूत करता है। रोग प्रतिरोधक शक्ति बढ़ाता है।

5. वेदनाहर — कैंसर का तेज दर्द जिसमें अंग्रेजी दवाएं भी अच्छा असर नहीं कर पाती हैं एैसी अवस्था में भी रोगी को आराम देता है, कैंसर के घाव को भरता है।

इस तरह से 5 तरह की दवाओं का सेट है जो तीसरे—चौथे स्टेज के रोगी को भी लाभ देता है।
√ इन दवाओं की खासियत है कि यह किसी भी रोगी को कोई भी साईड इफेक्ट नहीं देता है।

√ सुक्ष्मीकरण होने की वजह से सभी तरह के रोगियों के लिये साम्य हो जाता है, किसी भी प्रकृति के रोगी को दें सकते हैं,यहां तक की किमों के दौरान भी बिना भय के इसका सेवन किया जा सकता है।

≠ केवल 1 माह की दवा से ही आपको असर दिखने लगता है।
रोगी का डिटेल ​लेकर कैंसर के प्रकार के अनुसार दवाओं का कांबिनेशन होता है।

✣ इसके अलावा एक हर्बल पैक बनाया गया है जिसमें केवल वैद्यों की दवाओं का कांबिनेशन है
कोई रस—रसायन और भस्म नहीं है।
यह एक माह का 2500/- है।

रोगी की स्थिति, बलाबल अनुसार आप कोई भी दवा ले सकते हैं।

➲ कई बार कैंसर की तीव्रता देखकर कैंसर कैथेलियन और हर्बल पैक दोनों एक साथ देना होता है।

❖ निःशुल्क कैंसर परामर्श एवं आर्युवेदिक नुस्खे ❖

⎚ आर्युवेदिक ग्रंथों व कैंसर के नवीनतम् शोधों के अनुसार दवाओं का फार्मूला।

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⟴ वैद्य मुहम्मद अख्तर
रायपुर (C.G.)

⊚ 9302229602

01/12/2025

۞ लिंग की चमड़ी से ढंक जाना या ऊपर खींचने से दर्द होना…

↳ इसे फाइमोसिस कहते हैं। यह कई लोगों को उम्र बढ़ने के साथ हो जाता है। इसकी मुख्य वजह तो इंफेक्शन होता है, जिसकी वजह से चमड़ी मोटी हो जाती है। इसलिए ऐसे रोगियों का हेतू (कारण) समझना ज़रूरी है और वजह का भी इलाज करना होता है।

↳ इसकी कई वजह होती हैं, जैसे –
• रोगी को बार-बार यूरिन इंफेक्शन होता हो।
• लिंग की अच्छे से सफाई न होती हो।
• रोगी अगर एक्जिमा / दाद का ग्रसित हो।
• कई मधुमेह रोगियों में भी यह समस्या होती है।
• और भी कई वजह हो सकती हैं।

↳ अब इनका इलाज करने से पहले यह देखें कि वजह क्या हो सकती है, और वैद्य जी यह भी देखें कि अभी इनके लक्षण क्या हैं, क्या परेशानी आ रही है, जैसे –
• पेशाब में बदबू आना,
• पेशाब में जलन होना,
• लिंग में लाल या नीले धब्बे तो नहीं हैं, आदि।

↳ तो सबसे पहले वजह का इलाज करें, फिर कुछ नुस्खे हैं जो काम करते हैं –**

1. एक *कैलेंडुला क्रीम* आता है, जिसे लिंग में लगाकर चमड़ी को आगे-पीछे करें।
ऐसा 5 मिनट तक करें, दिन में दो बार या कोई बेहतर आयुर्वेदिक क्रीम प्रयोग करें लेकिन किसी तरह का तिला इस्तमाल न करें |

2. या शुद्ध नारियल तेल (बाजार का तेल नहीं) 100 ग्राम लेकर उसमें 200 ग्राम गेंदे के फूल की कलियों को अलग-अलग करके हल्की आँच में पकाएँ।
जब तेल पक जाए तो रख लें। अब इस तेल को रोज़ाना सुबह-शाम लिंग में और चमड़े के अंदर की तरफ अच्छे से लगाएँ और 5 मिनट बाद चमड़ी को आगे-पीछे की तरह सरकाएँ।
थोड़ा दर्द होगा लेकिन रोज़ाना करते रहने से फर्क आने लगेगा।

3. आप कैस्टर ऑयल का भी प्रयोग कर सकते हैं।

↳ यदि रोगी का इंफेक्शन ज्यादा हो, मवाद आता हो तो उनसे संबंधित औषधियों का सेवन करवाएँ**, जैसे –
आंवला, हर्रा, बेहरा, अकरकरा, शतावरी, नीम, तुलसी, हल्दी आदि का बना कोई कॉम्बिनेशन। हम बस्तर हर्बल्स में रोगियों को दवाओं का कॉम्बिनेशन देते हैं |

★ जब चमड़ी सही हो जाए तब उन्हें कामशक्ति वर्धक दवाएँ दीजिये।
उससे पहले तो सफाई और इंफेक्शन में ध्यान दीजिये।

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⌨️ रोग परिचय - 2 ⌨️
۞ Extracranial Germ Cell Tumor
〚एक्स्ट्राक्रेनियल जर्म सेल ट्यूमर〛 ۞
यह नाम इसलिए दिया गया है क्योंकि यह ट्यूमर शरीर की Germ Cells (प्रजनन कोशिकाएँ) से पैदा होता है,
जो सामान्यतः te**is या o***y (अंडाशय) में होती हैं, लेकिन जब ये कोशिकाएँ शरीर के अन्य अंगों में ट्यूमर बनाती हैं तो उन्हें extracranial कहा जाता है (मस्तिष्क के बाहर)।

⌬ साइंटिफिक नाम:
Extragonadal Germ Cell Tumor (EGGCT) या
Peripheral Non-CNS Germ Cell Neoplasm
↣ “Extragonadal” = गोनैड (te**is/o***y) के बाहर
↣ “Neoplasm” = असामान्य कोशिकीय वृद्धि (गांठ बनना)

⌬ आयुर्वेदिक नाम एवं सामान्य बोलचाल:

• बीजदोषजन्य अर्बुद
• शुक्र/अर्तवदूष्य अर्बुद

• गर्भजन्य गांठ
• गोनैड के बाहर की गांठ
• शरीर में गर्भकोशिकाओं से बनी ट्यूमर

⌬ परिचय:
यह ट्यूमर Germ Cells से उत्पन्न होता है — यानी वे कोशिकाएँ जो अंडाणु या शुक्राणु बनाती हैं।
यदि ये कोशिकाएँ गर्भ के दौरान शरीर में गलत जगह पर रुक जाएँ, तो बाद में ये गांठ बनाना शुरू कर सकती हैं।
यह ट्यूमर मुख्यतः बच्चों और किशोरों में होता है, और इसकी गंभीरता इस पर निर्भर करती है कि यह benign है या malignant।

⌬ शास्त्रीय सूक्त :
सुश्रुत संहिता, नि. 11/24:
“बीजं मूलं सर्वेषां रोगाणां देहसम्भवः।”
✤ शरीर में उत्पन्न हर रोग का मूल बीज (germinal tissue) में होता है।

⌬ कारण:

➤ जीन म्यूटेशन — जैसे KIT, KRAS gene में विकृति

➤ हार्मोन असंतुलन — गर्भ के दौरान हार्मोन के सही विकास में बाधा

➤ Cryptorchidism — अंडकोष का sc***um तक न आना

➤ Testicular dysgenesis — अंडकोष के विकास में दोष

➤ गर्भ निर्माण में बीज दोष या शुक्र/अर्तव दूषण

➤ वात व कफ दोष की असमय वृद्धि

➤ शरीर में दोषयुक्त धातु (रक्त, मांस, शुक्र)

➤ दोषयुक्त धातु से गांठ/अर्बुद का निर्माण

⌬ शरीर पर प्रभाव:
➤ गांठ के रूप में शरीर में असामान्य दबाव
➤ मल, मूत्र या मासिक धर्म में बाधा
➤ हार्मोनल गड़बड़ी, स्तनवृद्धि या पुरुष में स्त्रीलक्षण
➤ थकावट, बुखार, रक्त की कमी
➤ कैंसर फैलने पर लंग्स या लिवर पर असर
➤ अनियमित माहवारी या गर्भाशय से स्राव
➤ थकान, वज़न घटना, बुखार
➤ मूत्र मार्ग में रुकावट या pain
➤ elevated AFP, β-hCG, LDH markers
➤ हार्मोन असंतुलन के लक्षण

⌬ आयुर्वेदिक निदान:
• दोष: वात-कफ
• धातु: रक्त, मांस, शुक्र/अर्तव
• लक्षण: गांठ, स्त्राव, मूत्रदाह, हार्मोनल असंतुलन
• स्रोत: बीजदोष व धातुदोष
• निदान पद्धति: त्रिदोष परीक्षा, धातु द्रष्टि, उपशय-अनुपशय

✥ आयुर्वेदिक चिकित्सा दिशा :

➤ शोधन:
शरीर में जो दूषित धातु और बीज दोष से उत्पन्न विकृति है, उसके लिए पहले शरीर का सम्पूर्ण शोधन आवश्यक होता है।

➤ कफहर :
इस रोग में कफ दोष की अधिकता होती है जो गांठ को स्थिर, भारी और बढ़ने वाली बनाता है।

➤ वात शमन:
वात दोष इस गांठ को शरीर के मर्म स्थानों तक पहुँचाता है।

➤ बीजदोष पर उपचार:
गर्भजन्य बीज दोष को शुद्ध करने के लिए बीजरसायन चिकित्सा अपनाई जाती है,
जो शरीर की मूल धातुओं और प्रजनन अंगों को संतुलित करती है।

➤ रक्त और मांस धातु की पुष्टि:
इन धातुओं का पोषण और शुद्धिकरण दोनों एक साथ किया जाता है।
यह गांठ की प्रकृति को बदलने में सहायक होता है।

➤ रसायन चिकित्सा:
शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने, धातु-धातु के बीच संतुलन बनाने और कोशिकीय स्तर पर सुधार हेतु रसायन चिकित्सा दी जाती है।

あ याद रहे ↣
✪ यह रोग भ्रूण अवस्था की बीज कोशिकाओं के असामान्य विकास के कारण होता है।

✪ इसमें कफ और वात दोष की विशेष भूमिका होती है — इन्हें सबसे पहले शमन करना चाहिए।

✪ इस रोग का मूल बीजदोष में है, इसलिए बीजरसायन चिकित्सा आवश्यक है।

✪ आयुर्वेद इस रोग को केवल suppression नहीं, मूल से उखाड़ने की दिशा में देखता है।

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25/07/2025

۞ Extracranial Germ Cell Tumor – एक्ष्ट्राक्रेनियल जर्म सेल ट्यूमर (शरीर के बाहर जनन कोशिकीय अर्बुद) ۞
• Extracranial Germ Cell Tumor
• Non-CNS Gonadal/Extra-gonadal Germ Cell Neoplasm
• शुक्राणुजन्य अर्बुद / बीजदोषज गुल्म (आयुर्वेदिक संभावित नाम)

✤ शास्त्रीय सूक्त:
“गुल्मो वातानिलादिष्टो दोषैः संधार्यते च यः।
गात्रेऽपि जनितो यः स्यात् स गुल्मोsन्यत्र संस्थितः॥” — चरक संहिता, चि. 5/10
• जब दोषों का संचित विकार शरीर के अन्य भागों में गाँठ या ट्यूमर जैसा उभार बनाये, उसे गुल्म की भांति माना गया है।

✢ यह ट्यूमर आमतौर पर अंडकोष, अंडाशय या retroperitoneal क्षेत्र में उत्पन्न होता है।
✢ यह कैंसर बच्चों, युवाओं और किशोरों में अधिक देखा जाता है।
✢ Symptoms: abdominal lump, pain, fullness, nausea, urinary pressure

✢ आयुर्वेद में इसे बीजदोष, शुक्रधातु विकृति और गुल्म/अर्बुद के रूप में समझा जाता है।
• कारण – गर्भज दोष, वंशानुगत दुष्टि, विष, तनाव, शुक्रधातु का कुप्रभाव
• लक्षण – पेट में गांठ, भारीपन, मूत्रदाह, मलावरोध, बलक्षय

✥ आयुर्वेदिक चिकित्सा दिशा:
➻ बीजशुद्धि, शुक्रधातु संतुलन और दोषप्रशमन हेतु रसायन चिकित्सा दी जाती है
➻ शोथहर, गुल्महर और बल्य औषधों से ट्यूमर का प्रसार नियंत्रित किया जाता है
➻ स्नेह-बस्ती, योनिशोधन या मूत्राशय क्षेत्र पंचकर्म से प्रभावकारी सुधार लाया जाता है

あ याद रहे ↣
यह ट्यूमर शरीर के भीतर जन्मी कोशिकाओं से बनता है, जो मूक होकर लंबे समय तक बढ़ सकता है।
आयुर्वेद में इसका निदान बीज दोषों और शुक्रधातु के विकार से जोड़कर किया जाता है।
जल्दी पहचान, दोषहर चिकित्सा और रसायन चिकित्सा से आयुर्वेद इसमें असरकारी दिशा प्रदान करता है।

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#अर्बुदचिकित्सा
#आयुर्वेदिकउपचार
#जीआईएनईटीएस
#कार्सिनॉइडट्यूमर #हाइपरथाइरोइड

25/07/2025

۞ अनन्य चूर्ण ۞
— एक विशिष्ट त्रिदोषशामक, रसायन और शुद्धिकारी योग

⤝ घटक (Ingredients) — सभी समभाग चूर्ण रूप में
➲ कहुआ (Terminalia tomentosa) — वातशामक, रक्तशोधक।

➲ रोहिणा (Soymida febrifuga) — शोथहर, ज्वरघ्न, हृदयविकारहर।

➲ छोटी कटेरी (Solanum surattense) — कास, दमा, कफशोधन में प्रयोग।

➲ कंटकारी (Solanum xanthocarpum) — कफहर, मूत्रजनक, श्वास-रोगहर।

➲ लवण (Rock Salt – Saindhava lavana) — दीपनीय, वातहर।

➲ कर्मी (Mollugo cerviana) — ज्वरहर, मूत्रशुद्धि, रक्तसंचार।

➲ समुद्र फेन (Cuttlefish bone – marine foam) — शोषक, क्षारात्मक, वातकफहर।

➲ फिटकरी शुद्ध (Alum – Potash alum) — रक्तस्तंभक, कफहर।

➲ सालपर्णी (Desmodium gangeticum) — बल्य, दाहशामक, ज्वरनाशक।

➲ सनाय पत्ती (Cassia angustifolia) — रेचक, यकृत शोधक।

➲ मैदा लकड़ी (Litsea glutinosa) — गुल्म, आमवात में उपयोगी।

➲ भुई आंवला (Phyllanthus niruri) — यकृत रक्षक, हिपेटाइटिस व टाइफाइड में।

➲ भुई नीम (Andrographis paniculata) — एंटीवायरल, इम्युनिटी बूस्टर।

➲ आंवला (Emblica officinalis) — श्रेष्ठ रसायन, रक्तशोधक।

➲ हरण (Terminalia chebula) — त्रिदोषशामक, यकृतशुद्धि।

➲ बहेरा (Terminalia bellirica) — कफहर, विषघ्न, दीपन।
📌 इन सबका महीन चूर्ण बनाकर समभाग मिलाएँ।

⤝ मात्रा व सेवन विधि (Dosage & Administration)
➤ सामान्य वयस्क: चूँकि हम जंगल की ताजी औषधियों से बनाते है इसलिय केवल 0.5–1 ग्राम, अगर पंसारी से ले रहे हैं तो 3 से 5 ग्राम की मात्रा |

➤ सेवन काल: सुबह व शाम खाली पेट

➤ अनुपान: ठंडा पानी या गुनगुना पानी

➤ बालकों के लिए: 12 वर्ष तक आधे ग्राम से भी कम मात्रा में दें

➤ प्रोस्टेट रोगियों हेतु: भोजन के बाद देना अधिक उपयुक्त।

⤝ गुणधर्म (Therapeutic Properties)
✦ त्रिदोषहर — वात, पित्त, कफ संतुलक।
✦ रसायन — धातुपोषक व पुनर्निर्माता।
✦ रक्तशोधक — विषाक्त रक्त को शुद्ध करता है।
✦ ज्वरहर — विशेषकर टाइफाइड, वायरल व अज्ञात ज्वर में प्रभावी।
✦ पाचनदीपन — मंदाग्नि, आम दोष निवारक।
✦ हिपेटोप्रोटेक्टिव — यकृत सुरक्षा व पुनः निर्माण।
✦ इम्युनोमॉडुलेटर — HIV व कैंसर जैसी जटिल बीमारियों में रोग प्रतिरोधक शक्ति को बढ़ाता है।

⤝ लाभ (Clinical Benefits)
✪ टाइफाइड, एलर्जी, वायरल बुखार व रह-रह कर आने वाला ज्वर

✪ मधुमेह (Diabetes mellitus) में सहायक चूर्ण

✪ शारीरिक कमजोरी, पौरुष दोष व शुक्राणु की कमी

✪ बवासीर, गुल्म व वातज उदर रोगों में

✪ त्वचा विकार — मुंहासे, खुजली, दाद

✪ मोटापा और दोषयुक्त चयापचय (metabolic disorder)

✪ कैंसर रोगियों में बुखार, पाचन और अपच के नियंत्रण हेतु सहायक दवा

✪ HIV, HCV, हेपेटाइटिस जैसे संक्रमण में supportive therapy के रूप में उपयोगी।
✪ अनन्य चूर्ण को किसी भी रोगी को लम्बे समय तक भी दिया जा सकता है |

⤝ वैज्ञानिक प्रमाण -
★ Phyllanthus niruri (भुई आंवला) — Proven anti-hepatitis B and anti-cancer properties. [Journal of Ethnopharmacology, 2022, DOI: 10.1016/j.jep.2021.114869]

★ Andrographis paniculata (भुई नीम) — Contains Andrographolide, a compound known for immune-boosting and antiviral effects. [Phytotherapy Research, 2020, DOI: 10.1002/ptr.6660]

★ Desmodium gangeticum (सालपर्णी) — Demonstrated anti-inflammatory and antipyretic activities. [Indian Journal of Experimental Biology, 2021]

★ Terminalia chebula, bellirica, emblica (त्रिफला द्रव्य) — Exhibits strong antioxidant and anticancer activity. [Frontiers in Pharmacology, 2023, DOI: 10.3389/fphar.2023.1185274]

⤝ ग्रंथ सन्दर्भ -
➲ भैषज्य रत्नावली (Bh.R.) – ज्वराधिकार, गुल्माधिकार, मेहाधिकार
➲ धन्वंतरि निघण्टु – मूलवर्ग, कन्दवर्ग, लवणवर्ग
➲ चरक संहिता, सूत्रस्थान 27 – त्रिफला और हरीतकी के प्रभाव
➲ कायचिकित्सा भाग – रसायनाध्याय – दीपन पाचन, धातु पुष्टिकरण में प्रयोग

あ याद रहे -
⇏ यह योग किसी भी प्रकृति के रोगी को दिया जा सकता है।

⇏ इसे किसी भी कैंसर या गंभीर रोग के मुख्य रसायन के साथ जोड़ा जा सकता है।

⇏ यह शुद्धता, प्रभाव और सुरक्षा तीनों दृष्टि से प्रमाणित है।

⇏ अगर रोगी बहुत दुर्बल हो, खून की कमी हो, बुखार बार-बार आता हो — तो यह दवा जरुर देना चाहिए ।

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